उत्तराखंड की जल संरक्षण की पारंपरिक तकनीक अन्य राज्यों के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगी। पारंपरिक ज्ञान पर आधारित इन तकनीकों के माध्यम से प्रदेश के लोग पिछले कई दशकों से जल संरक्षण और स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम कर रहे हैं। शुक्लापुर स्थित हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हैस्को) के निरीक्षण के दौरान नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार ने इसकी आवश्यकता जताई।
उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन की इन तकनीकों के कई लाभ हैं। एक, किल्लत वाले इलाकों में पानी की जरूरतें भी पूरी होती हैं। उन्होंने कहा कि हैस्को ने इन पारंपरिक तकनीकों के साथ आधुनिक ज्ञान का समावेश किया है, जिससे यह ज्यादा लाभकारी हो गया है। नदी को पुनर्जीवित करने की हैस्को की पहल का भी स्वागत होना चाहिए। दूसरा, जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए हैस्को ने वर्षा जल संरक्षण (रेन वाटर हार्वेस्टिंग), जल इकाइयों, तालाब, चेक डैम बनाने के प्रयास किए हैं, जिससे भूजल के स्तर में सुधार भी हो रहा है। यह पानी कई गांवों के लोगों की जरूरतों को पूरा कर रहा है।
हैस्को के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि स्थानीय इकोनॉमी के लिए इकोलॉजी बेहद जरूरी है। हमने अनुरोध किया कि सकल पर्यावरण उत्पाद को लेकर आयोग भी बातचीत करे। उन्होंने कहा कि नीति आयोग को हिमालय दिवस का आयोजन करने की पहल करनी चाहिए।
हिमालय हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी
डॉ. राजीव ने कहा कि हिमालय का संरक्षण हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। संरक्षण केवल हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की जिम्मेदारी नहीं है। न ही वह अकेले इसे कर सकते हैं। हालांकि वह अपनी ओर से इसका पूरा प्रयास करते हैं। कई बार उन्हें हिमालय संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
कार्बन क्रेडिट से होगा उत्तराखंड को लाभ
डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि उत्तराखंड को कार्बन क्रेडिट से लाभ हो सकता है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की यूएन क्लाइमेट चेंज और यूएन इनवायरमेंट प्लान कार्बन क्रेडिट देते हैं। कहा कि अब तक राज्य सरकार ने ग्रीन बोनस के लिए बहुत प्रयास किए हैं। हालांकि, उसका लाभ नहीं मिला है। नीति आयोग अगर किसी एक राज्य को ग्रीन बोनस देगा तो अन्य राज्य भी इसके लिए प्रतिस्पर्द्धा करेंगे। इसके बजाय कार्बन क्रेडिट का विकल्प बेहतर है।