आठ महीने पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के लिए एक आदेश जारी किया। आदेश था कि एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज किया जाए।
आदेश बेहद महत्वपूर्ण
जून 2013 में पत्र दिल्ली से देहरादून के लिए चला, लेकिन रास्ते में कहीं गायब हो गया। दून पुलिस को अब तक इस आदेश की प्रति नहीं मिल सकी है।
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जबकि पीड़ितों को न्याय, सुरक्षा मुहैया कराने और पुलिस की जिम्मेदारी तय करने के लिहाज से यह आदेश बेहद महत्वपूर्ण है।
खुड़बुड़ा निवासी अधिवक्ता पीएन शर्मा ने दून पुलिस के लोक सूचना अधिकारी से ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए आदेश के बारे में जानकारी मांगी थी।
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लेकिन जवाब में लोक सूचना अधिकारी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से अब तक इस तरह का कोई दिशानिर्देश हासिल न होने की बात कही है।
आदेश के मुख्य बिंदु
- किसी भी अपराध की जानकारी मिलने पर पुलिस का एफआईआर दर्ज करना जरूरी है। रिपोर्ट न लिखने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ लोकसेवक अवहेलना कानून के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाए। आरोप साबित होने पर एक साल तक की सजा हो सकती है।
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- पीड़ित व्यक्ति देशभर में कहीं भी, किसी भी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र है। अगर जांच में मामला दूसरे थाने का पाया जाता है, तो पुलिस इसे संबंधित थाने को ट्रांसफर कर सकती है।
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यूं तो किसी भी पीड़ित की एफआईआर अनिवार्य रूप से दर्ज करने के निर्देश हैं। देश की सर्वोच्च अदालत भी यह निर्देश दे चुकी है। लेकिन एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस वालों को जेल भेजने संबंधी केंद्रीय गृह मंत्रालय का ऐसा कोई आदेश हमारे कार्यालय को अब तक नहीं मिला है।
- अमित सिन्हा, डीआईजी गढ़वाल और प्रथम अपीलीय अधिकारी