निर्णय को समझ नहीं पाए
पिथौरागढ़ निवासी एवं उत्तराखंड त्रिस्तरीय पंचायत संगठन की राज्य संचालन समिति के कार्यक्रम संयोजक जगत मर्ताेलिया कहते हैं, जनजातियां अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए जानी जाती हैं। जनजाति समाज के कई आंतरिक मामले व सामाजिक कार्य अन्य से अलग होते हैं। ऐसे में सरकार को उन्हें पूरी तरह से यूसीसी से बाहर ही रखना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब माणा गांव गए थे, तो उन्होंने भी माना था कि जनजाति समुदाय के लोगों की संस्कृति अपने आप में विशिष्ट पहचान रखती है। उत्तरकाशी के डुंडा निवासी जाड़ समुदाय के सेवानिवृत्त शिक्षक सेवाराम भंडारी भी यूसीसी से बाहर रखे जाने के निर्णय को समझ नहीं पाए हैं।
प्रदेश में इन जनजातियों को रखा गया यूसीसी से बाहर
राज्य में पांच प्रकार की जनजातियां हैं जिनमें थारू, बोक्सा, राजी, भोटिया और जौनसारी समुदाय शामिल हैं। चीन के साथ 1962 की लड़ाई के बाद 1967 में इनको संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत जनजाति समुदाय में शामिल करने के लिए अधिसूचित किया गया।
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विशेषज्ञ समिति इसलिए रखा बाहर
भारत के संविधान के भाग 21 और अनुच्छेद 366 के खंड (25) में जनजातीय सदस्यों के परंपरागत अधिकार संरक्षित हैं। विशेषज्ञ समिति को जन संवाद के दौरान जनजातीय समूहों ने यह इच्छा जाहिर की कि वे अपने यहां कुरीतियों को समाप्त करने के पक्षधर हैं। लेकिन उन्हें आपसी सहमति बनाने के लिए कुछ अधिक समय की आवश्यकता है।