लोकसभा चुनाव के नतीजे जहां भाजपा कांग्रेस प्रत्याशियों की जीत हार पर मुहर लगाएंगे वहीं क्षेत्रीय दल उक्रांद का भविष्य तय होगा।
देश की राजनीति में कांग्रेस भाजपा के मुकाबले में तीसरा विकल्प बनाने में क्षेत्रीय दल अब तक असफल रहे हैं। मत फीसदी में उक्रांद की हिस्सेदारी तय करेगी कि प्रदेश की राजनीति में उसका भविष्य क्या रहेगा।
घटा है क्षेत्रीय दलों का जनाधार
प्रदेश में क्षेत्रीय दलों के जनाधार के साथ उनकी संख्या में भी कमी आई है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड रक्षा मोर्चा का पहले आम आदमी पार्टी में विलय और फिर दल को खड़ा करने वाले टीपीएस रावत का कांग्रेस में जाना क्षेत्रीय दलों की राजनीति के लिए बड़ा झटका रहा।
दूसरी तरफ आपसी विवादों से जूझ रहे सबसे पुराने क्षेत्रीय दल उक्रांद के धड़ों की लड़ाई पर निर्वाचन आयोग की सख्ती भारी पड़ी।
नतीजों के बाद मिलेगा असली वारिस
आयोग ने उक्रांद के दो खेमों में चल रही लड़ाई के बाद उनके प्रत्याशियों को निर्दलीय करार देकर क्षेत्रीय दल को एक तरीके से गायब कर दिया। 2009 के लोकसभा चुनाव तक डेढ़ फीसदी मतों में हिस्सेदारी वाले उक्रांद के इस बार निर्दलीय के तौर पर प्रत्याशी चुनावी मैदान में तो उतरे, लेकिन धड़ेबाजी खत्म नहीं हुई।
काशी सिंह ऐरी समर्थित उक्रांद और त्रिवेंद्र पंवार समर्थित उक्रांद खेमा आमने सामने दिखा। अब चुनाव नतीजे आने के बाद न केवल यह साबित होगा कि उक्रांद का कौन से धड़ा बड़ा है बल्कि यह भी सामने आएगा कि पार्टी के खाते में कितना मत फीसदी आता है।
उक्रांद के निर्दलीय प्रत्याशियों के अलावा किसी अन्य क्षेत्रीय दल ने पांचों सीटों पर प्रत्याशी नहीं उतारे।
क्षेत्रीय दल पर कितना भारी पड़ेगी आप
चुनाव प्रचार में उक्रांद के मुकाबले कहीं अधिक सक्रिय रही आम आदमी पार्टी की चुनाव के नतीजों पर नजर है। भाजपा कांग्रेस और बसपा के साथ आप के पांचों सीटों पर प्रत्याशी रहे हैं।
हालांकि आप अपना मुकाबला क्षेत्रीय दल उक्रांद से नहीं मानती है, लेकिन उसके लिए मतों में हिस्सेदारी भविष्य के चुनावी मुकाबलों के लिए अहम रहेगी। आप के मजबूत होने का सीधा असर क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर दिखेगा।