पार्टी में मौजूद तमाम दिग्गज दावेदारों को पछाड़ते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे त्रिवेंद्र रावत की राह इतनी आसान नहीं थी। यह बात अलग है कि वे प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चहेतों में शुमार हैं। फिर भी कुछ संयोग ऐसे बने, जिनके बूते लो-प्रोफाइल त्रिवेंद्र को उत्तराखंड की सत्ता की शीर्ष कुर्सी मिली।
उत्तराखंड में भाजपा की राजनीति के दिग्गजों में शुमार पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी इस बार अपनी अधिक उम्र और खराब सेहत के कारण मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से पहले ही दूर हो चुके थे। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का बार-बार यह कहना कि 2020 में वे सक्रिय राजनीति से दूर हो जाएंगे, इस चुनाव में सीएम पद के लिए उनकी दावेदारी पर भारी पड़ गया।
बचे डा. निशंक, तो उनके पुराने कार्यकाल की चर्चा मात्र से ही उनका पत्ता साफ हो गया था। इसके बाद सीएम की कुर्सी के लिए अगली पीढ़ी के चार प्रमुख दावेदार सामने आए। इनमें त्रिवेंद्र रावत के अलावा सतपाल महाराज, अजय भट्ट और प्रकाश पंत थे।
सतपाल महाराज 2014 के लोकसभा चुनाव के करीब भाजपा में शामिल हुए। ताजा-ताजा भाजपाई होने के चलते केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर दांव लगाना उचित नहीं समझा। हालांकि बहुगुणा कैंप के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी उन्हें सीएम बनाने के लिए भरसक प्रयास किए।