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...तो ऐसे पहुंचने वाली थी मसूरी में रेल

Sun, 16 Feb 2014 04:25 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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अगर देहरादून के राजपुर में शहंशाही आश्रम से चंद मीटर आगे मसूरी टोल चौकी के पास सुरंग बनाते समय मजदूर दबे न होते तो रेल दून से पहले मसूरी पहुंचती।
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बकौल इतिहासकार गोपाल भारद्वाज वर्ष 1921 में हिंदुस्तान के कुछ राजा-रजवाड़ों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर मसूरी-देहरा ट्राम वे कंपनी बनाई। कंपनी ने 23 लाख रुपए की अनुमानित लागत से देहरादून से मसूरी रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था।

1924 में रोक दिया गया प्रोजेक्ट

राजपुर शहंशाही आश्रम से कुछ आगे पुराने मसूरी टोल पर सुरंग बनाने का काम शुरू किया गया। लेकिन बताया जाता है कि सुरंग बनाते समय कुछ मजदूर दबकर मर गए और अन्य मजदूरों ने काम करना छोड़ दिया, जबकि कंपनी टोल तक पटरियां ला चुकी थी।

दो साल मसूरी टोल से आगे सुरंग बनाने का काम भी चला। लेकिन वर्ष 1924 में इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया। इसके बाद तय हुआ देहरादून से मसूरी को इलेक्ट्रिक ट्रेन ट्रैक बनाया जाए और ग्लोगी पावर हाउस से बिजली की सप्लाई की जाए।

बिटिश हुकूमत ने तैयार किया था मैप

इसी रेल लाइन बिछाए जाने की प्रत्याशा में वर्ष 1888 में झड़ीपानी में ओक ग्रोव स्कूल की स्थापना की गई। लेकिन प्रोजेक्ट परवान नहीं चढ़ सका। आज भी ओकग्रोव स्कूल का संचालन उत्तरी रेलवे द्वारा किया जाता है।

1893 में व्यापारियों ने किया था विरोध
मसूरी तक रेल बिछाने के मसौदे की बात करें तो इसे 1893 में तैयार किया गया था। उस वक्त बिटिश हुकूमत ने हर्रावाला से सीधे शंहशाही आश्रम होते हुए ओकग्रोव स्कूल, झड़ीपानी, बार्लोगंज के बाद कुलड़ी के पास हिमालय क्लब में स्टेशन बनाने का रोड मैप तैयार किया था।
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व्यापारियों ने किया था रेल लाइन का विरोध

मगर उस वक्त देहरादून में अधिकांश इलाके में चाय और बासमती चावल की खेती होती थी। ये दोनों ही नकदी फसल के तौर प्रमुख व्यापार में शुमार था।

लिहाजा, दून के व्यापारियों ने हर्रावाला से सीधे मसूरी रेल लाइन बिछाने का विरोध कर दिया। इस तरह पहली बार मसूरी रेल लाइन बिछाने की सोच को झटका लगा।
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