शहर के ट्रैफिक को व्यवस्थित बनाने के लिए कई योजनाएं बनीं, लेकिन आजतक किसी पर भी अमल नहीं किया गया। बॉटल नेक हटाने, सड़कों पर अतिक्रमण मुक्त बनाने और फुटपाथ के निर्माण में इच्छाशक्ति की कमी रही। पुलिस ने जहां सख्ती दिखाई, वहीं सियासी नफे नुकसान के चलते उसे बैकफुट पर आना पड़ा।
शहर में केवल एक मार्ग राजपुर रोड ऐसा है जिस पर यातायात संचालित और व्यवस्थित बनाए रखना चुनौती है। बॉटल नेक बने आढ़त बाजार को शिफ्ट करने की योजना सियासी दाव पेंच में फंसी है। सहारनपुर चौक, महाराजा अग्रसेन चौक, दर्शनलाल चौक और मेन घंटाघर के जीर्णोद्वार को कारगर प्लान लागू नहीं किया जा सका है।
सड़कों से खंभे तक नहीं हटे
बर्षों से सड़क के बीच बाधा बने बिजली और टेलीफोन के खंभे नहीं हट सके। ट्रैफिक पर सामूहिक जिम्मेदारी फिक्स करने के बजाए केवल पुलिस पर बेलगाम ट्रैफिक का ठीकरा फोड़ा जाता रहा है। पुलिस ने जब-जब सख्ती दिखाई, तब तब सरकार अथवा जनप्रतिनिधि रोड़ा बन गए।
हाल ही में पलटन बाजार इसका उदाहरण है, जिसमें बनाई ट्रैफिक व्यवस्था सियासी दखल के बाद बैकफुट पर आ गई। ट्रैफिक को अलग से विभाग का दर्जा देने, ट्रैफिक पुलिस लाइन बनाने, बल बढ़ाने और बड़ी क्र्रेन खरीदने के प्रस्ताव फाइलों में धूल फांक रहे हैं। पार्किंग जैसी जरूरी सुविधाएं भी वाहन चालकों को आज तक नहीं मिल पाई हैं।
53 में 23 पर होमगार्ड
राजधानी में यातायात के सुचारु संचालन के लिए 53 प्वाइंट चिह्नित किए गए, जिनमें से सिर्फ 30 को ही ट्रैफिक पुलिस क वर कर रही है। बाकी की जिम्मेदारी होमगार्ड के कंधों पर है। यह बात अधिकारी भी स्वीकार करते हैं कि होमगार्ड की उतनी जवाबदेही नही है जितनी ट्रैफिक पुलिस के जवान की होती है। अधिकतर ट्रैफिक जवान वीआईपी ड्यूटी में लगे रहते हैं।