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इस वीकेंड राम लीला का आनंद

Fri, 11 Oct 2013 06:19 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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पूरे देश सहित देवभूमि उत्तराखंड में इन दिनों दशहरे का माहौल है। इस सप्ताह अगर आप घूमने का प्लान कर रहे हैं तो हम आपको बताएंगे इस वीकेंड पर आपके पास क्या है मौके?
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राजधानी दून सहित इन दिनों उत्तराखंड के हर क्षेत्र में रामलीलाएं हो रही है। कई राम लीलाएं ऐसी भी हैं जो अपनी विशेषता के लिए पूरे उत्तराखंड में प्रसिद्घ हैं। इस दशहरे की छुट्टियों को आप इन राम लीलाओं के साथ ही पहाड़ की सुंदर वादियों का लुत्फ उठा सकते हैं।

देहरादून के स्कूलों और विभिन्न संगठनों द्वारा राम लीला का मंचन किया जा रहा है। राजधानी में श्री गुरु नानक इंटर कॉलेज, रामलीला बाजार सहित अन्य स्थानों पर राम लीला आयोजित की जाती है।
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आप परेड ग्राउंड, क्लेमनटाउन के दशहरा मैदान और प्रेमनगर में होने वाले दशहरे का मजा ले सकते हैं। शहर में हो रही रामलीलाओं की एक खासियत और है कि इन लीलाओं में से अधिकतर में स्थानीय लोगों द्वारा ही अभिनय किया जाता है। कई जगह पहाडों पर होने वाली राम लीला स्थानीय बोली में भी आयोजित की जाती है।

यहां नहीं होता था राम राजतिलक
नई टिहरी में आयोजित हो रही ऐतिहासिक रामलीला से टिहरी बांध की झील में डूबी पुरानी टिहरी की यादें ताजा हो रही हैं। पुरानी टिहरी में राजशाही के दौरान 1940 के दशक में शुरू हुआ रामलीला का मंचन वर्ष 1948 में टिहरी रियासत के महाराजा रहे नरेंद्रशाह के निधन व रियासत के विलय के उठापटक के दौरान दो वर्ष तक नहीं हुआ था।

उसके बाद 1951 से टिहरी डूबने के आखिरी क्षण 2002 तक रामलीला हुई थी। शहर नई टिहरी, अन्य जगह बस गया। पर शहर के स्थापित होने के बाद रामलीला का मंचन नहीं हुआ।

यहां की रामलीला की खासियत यह थी कि टिहरी पर राजा के शासन करने के कारण लीला में भगवान राम का राजतिलक नहीं किया जाता था। इसके साथ ही आप यहां टिहरी डैम और झील का आनंद ले सकते हैं। पर इसके लिए डैम के संरक्षक एंव अधिकारियों से अनुमति लेना जरूरी होता है।

श्रद्धा का अनुष्ठान
पौड़ी में इस बार 116वीं रामलीला का मंचन किया जा रहा है। जिसके लिए यहां खास इंतजाम किए गए हैं। सदियों से यहां अनवरत आयोजित हो रही राम लीला को लोग यज्ञ की तरह अहमियत देते हैं।

पौड़ी के रामलीला मैदान की मौजूदा हालात हालांकि काफी हाईटैक हो गए हैं। लेकिन यहां लोग उन दिनों को भी नहीं भूले जब राम भक्त मैदान की ढलुवा जमीन की मिट्टी पर बैठकर लीला का आनंद उठाते थे।

आस्था के प्रतीक रामयज्ञ ने अपने 116 वर्ष के सफर में कई गौरव हासिल किए हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के आमंत्रण पर दिल्ली में हुए राम लीला मंचन ने पौड़ी को राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाई थी।

प्रोजेक्टर से कर रहे राम दर्शन
श्रीनगर में इस बार अनोखी राम लीला देखने को मिल रही है। बागवान क्षेत्र के लोग इस बार प्रोजेक्टर के माध्यम से भगवान श्रीराम की लीलाओं को देख रहे हैं। गांव में श्रीराम सेवा समिति की ओर से प्रोजेक्टर के माध्यम से रामानंद सागर की रामायण ग्रामीणों को दिखाई जा रही है।

इसके साथ ही जौनसार बावर का एक गांव उत्पाल्टा बड़े स्तर पर युद्ध की तैयारी कर रहा है। लेकिन यह युद्घ हथियारों से नहीं बल्कि गागली (अरबी) की डंठलों से लड़ा जाता है।

पौराणिक मान्यता है कि गांव को श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए हर साल दशहरे पर गांव में इस युद्ध का आयोजन किया जाता है, स्थानीय भाषा में इसे पाइता पर्व कहते हैं। दशहरे के दिन दो घंटे तक पहले आपस में यह युद्घ होता है इसमें उत्पाल्टा और कुरोली गांव के लोग भाग लेते हैं, फिर एक दूसरे को गले मिलकर पर्व की बधाईयां दी जाती हैं।

इस दौरान खूब नाच गाना भी होता है। इस युद्ध में भाग लेने के लिए दूर दराज के गांव और शहरों में बसे स्थानीय लोग भी गांव आते हैं।

क्यों होता है युद्ध
मान्यता है कि सत्रहवीं सदी में उत्पाल्टा गांव की दो बहनें रानी और मुन्नी गांव से कुछ दूर क्याणी नामक स्थान पर कुएं से पानी भरने गई थी। रानी कुएं में गिर गई, मुन्नी रोती हुई घर पहुंची तो लोगों ने उसी पर बहन को कुएं में धकेलने का आरोप लगाया। व्यथित होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगा दी।

तब से गांव के लोग बहुत व्यथित हैं और इसके पश्चाताप के लिए पाइता पर्व पर रानी और मुन्नी की मूर्तियों को कुएं में विसर्जित किया जाता है। खत स्याण राजेंद्र सिंह राय के अनुसार जब तक दशहरा के दिन दो कन्याएं गुन्नी और रानी के पुनर्जन्म के रूप में गांव में पैदा नहीं हो जाती तब तक हर साल पाइता पर्व पर युद्ध का आयोजन होता रहेगा।
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