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भारत की आत्मा और व्यवस्था का आधार है भारतीय संविधान : जस्टिस धूलिया

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Iछात्रों को न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने पढ़ाया संविधान का पाठ
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Iभारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा और लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। यह एकता और अखंडता का प्रतीक है। यह बातें शनिवार को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने कहीं।I
Iग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित समारोह कार्यक्रम में न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने छात्रों को जिंदगी में हर निर्णय र्ईमानदारी और साहस के साथ लेने का मंत्र दिया। उन्होंने अनुच्छेद-14 का उल्लेख करते हुए कहा, यह प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, जो सामाजिक न्याय की नींव है। संविधान में समानता को मशीनी तरीके से नहीं, बल्कि सामाजिक व व्यवहारिक रूप से स्थान दिया गया है। कहा, राज्य के नीति निदेशक तत्व संविधान के ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांत हैं, जो सरकार को समाज के हर वर्ग के कल्याण के लिए प्रेरित करते हैं। ये सिद्धांत आर्थिक और सामाजिक न्याय की स्थापना में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं, इस मौके पर उन्होंने ग्राफिक एरा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन डॉ. कमल घनशाला के शिक्षा जगत में योगदान की सराहना करते हुए कहा, ग्राफिक एरा आज एक विशाल वृक्ष के समान है, जो समाज को ज्ञान, नवाचार और अनुशासन के रूप में फल दे रहा है। वहीं, विवि प्रो. चांसलर डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने कहा, ग्राफिक एरा में उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ ही छात्र-छात्राओं को सामाजिक न्याय, मूल्यों और महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस मौके पर ग्राफिक एरा के स्कूल ऑफ लॉ की डीन डॉ. डेजी एलेक्जेंडर, प्रो. वीसी प्रो. संतोष एस. सर्राफ, कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह, लेबर कोर्ट की पीठासीन अधिकारी कहकशां खान, हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीपी नौटियाल आदि मौजूद रहे।
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Iअधिकारों को जानना ही पर्याप्त नहींI
Iन्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने कहा, केवल अपने अधिकारों को जानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्तव्यों की समझ और संविधान के मूल्यों का सम्मान भी आवश्यक है। उन्होंने सहिष्णुता और सांस्कृतिक विविधता को भारतीय लोकतंत्र की ताकत बताते हुए युवाओं से संविधान का गहन अध्ययन करने और जिम्मेदार नागरिक बनने की आह्वान किया।I
Iहर नागरिक को होनी चाहिए संविधान की जानकारीI
Iजस्टिस धूलिया ने कहा, हमारा संविधान इसलिए भी अलग है कि हमने इसे कहीं से लिया नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों, स्कॉलर्स, वकीलों, पत्रकारों और नेताओं ने हर बिंदु पर विस्तार से विचार विमर्श करने के बाद इसे तैयार किया है। संविधान की जानकारी हर नागरिक को होनी चाहिए। न्यायमूर्ति धूलिया ने भारतीय संविधान की मूल भावना, विशेष रूप से अनुच्छेद-14, समानता, सहिष्णुता, मूल्य आधारित समाज और राज्य के नीति निदेशक तत्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
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Iविविधताओं का देश है भारतI
Iन्यायाधीश धूलिया ने कहा, भारत दूसरे देशों से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि यह विविधताओं का देश है। जहां हर 100 किलोमीटर बाद भाषा, खानपान, पहनावा बदलता है, इसके बावजूद एकता बनी हुई है। यह एकता संविधान से मिली है। हमारा संविधान इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसमें मानवीय गरिमा को स्थान दिया गया है। मानवीय गरिमा को साहित्य, कविताओं और सिनेमा के जरिए समझा जा सकता है।
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Iसपनों के लिए अभी बाकि है लंबी लड़ाई I
Iन्यायाधीश धूलिया ने कहा, उत्तराखंड बहुत संघर्षों के बाद बना है। कई कुर्बानियां देने के बाद यह राज्य बना है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि इन 25 सालों में कुछ नहीं हुआ, लेकिन उत्तराखंड के सपनों को साकार करने के लिए अभी लंबी लड़ाई बाकि है। लेकिन आज मैं सिर्फ उत्तराखंड की नहीं बल्कि देश और संविधान की बात करने आया हूं।I
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