मामला मीडिया में आने के बाद जिला प्रशासन ने बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग कराने को कहा है कि वे बच्चियों को माहवारी के दौरान स्कूल जाने दें।
स्कूल की टीचर ने बताया कि वे लड़कियों की काउंसलिंग करती हैं कि वे स्कूल आना न छोड़ें लेकिन उनके माता-पिता उनके ऊपर दबाव बनाते हैं। माता-पिता से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि अगर वे माहवारी के समय लड़कियों को स्कूल भेजेंगे तो उनका समुदाय उन्हें बहिष्कृत कर देगा इसलिए वे लोग उन्हें ऐसे समय में स्कूल जाने की अनुमति नहीं दे सकते।
दल तड़ीगांव, जलतुरी, ध्याण, क्वीतड़, सौरिया गांव से पंचेश्वर की ओर रवाना हुआ। सौरिया गांव में वार्ता के दौरान पता चला कि आंगनबाड़ी और हाईस्कूल होने के बावजूद अब भी अधिकतर लड़कियां पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं।
इसकी वजह पूछने पर पता चला कि जिस स्थान पर इंटर कॉलेज है, वहीं पास में चौमू देवता का स्थान है। माहवारी के दिनों में लड़कियों के उस स्थान से गुजरने पर पाबंदी है। दल की अगुवाई कर रहीं नैनीताल विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. उमा भट्ट ने बताया कि उनकी सेल में कई छात्राओं से बात हुई।
छात्राओं ने भी इस परंपरा को गलत करार दिया। शिक्षक छात्राओं को विद्यालय आने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन परिजन जाने नहीं देते हैं। आर्थिक रूप से संपन्न कुछ लोगों ने अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए पिथौरागढ़ और अन्य स्थानों पर रिश्तेदारों के घर भेज दिया है।
बेटियों के साथ भेदभाव की यह परंपरा काफी व्यथित करती है। बेटियों के साथ भेदभाव खत्म होना चाहिए और उन्हें खुले आसमान में उन्मुक्त उड़ने का मौका मिलना चाहिए।
-डॉ. उमा भट्ट, पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल
किसी भी बेटी को माहवारी के दौरान शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यदि कुछ क्षेत्रों में इस तरह की बात सामने आ रही हैं तो शिक्षा विभाग के अधिकारियों के माध्यम से जांच कराई जाएगी। साथ ही परिजनों और ग्रामीणों से भी वार्ता कर बेटियों को विद्यालय भेजा जाएगा।
- वंदना, मुख्य विकास अधिकारी/ब्रांड एंबेसडर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ