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शिष्यों के लिए इन गुरुओं ने की ऐसी 'तपस्या', जानकर करेंगे सैल्यूट

Mon, 05 Sep 2016 11:54 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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teacher - फोटो : amar ujala
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शिक्षकों पर अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे समय पर स्कूल नहीं आते, आते भी हैं तो पूरे समय ठीक से नहीं पढ़ाते, लेकिन कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं जिन्होंने उल्लेखनीय कार्य कर अन्य शिक्षकों के सामने मिसाल पेश की है।
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इसमें एक हैं हुकम सिंह जो बगैर सरकारी मदद के आवासीय स्कूल चला रहे हैं। वहीं जीआईसी बुरासखंडा में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता कमलेश्वर प्रसाद भट्ट अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर पिछले आठ साल से बच्चों को हर छुट्टियों में निशुल्क कोचिंग देते आ रहे हैं। आज शिक्षक दिवस के मौके पर इन्हें राजभवन में सम्मानित किया जाएगा।

दून के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा में वर्ष 2008 में 16 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन मुश्किल से पांच छात्र स्कूल आते थे। घटती छात्र संख्या के चलते स्कूल बंदी की कगार पर था। इसी दौरान कालसी से स्थानांतरित होकर स्कूल में पहुंचे हुकम सिंह ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर न सिर्फ स्कूल को बंद होने से बचाया बल्कि सरकार और शिक्षकों के सामने एक मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने जर्जर हाल स्कूल के लिए सरकार का मुंह ताके बगैर जनता से सहयोग लिया और इसे आवासीय विद्यालय के रूप में संचालित किया। उनके इस आवासीय विद्यालय में अनाथ, गरीब, स्कूल से बाहर रह गए 162 बच्चे अध्ययनरत हैं।
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वहीं जीआईसी बुराखंडा के 53 वर्षीय शिक्षक कमलेश्वर प्रसाद भट्ट अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पिछले आठ साल से बच्चों को गणित, विज्ञान और अंग्रेजी की कोचिंग देते आ रहे हैं। आईआरडीई से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक बीके डोभाल, शिक्षक केपी सती और शिक्षक परमवीर कठैत मिलकर बाल भवन में उत्तराखंड बोर्ड के परीक्षार्थियों को निशुल्क कोचिंग देते आ रहे हैं। यह सब वह अपने काम के बाद समय निकालकर करते हैं।

गुरुजनों का आज होगा सम्मान
उल्लेखनीय कार्य पर आज राज्यपाल राजभवन में प्रदेश के 26 शिक्षकों को गवर्नर्स अवार्ड से पुरस्कृत करेंगे। यह अवार्ड शिक्षा गुणवत्ता में सुधार के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य पर शिक्षकों को दिया जाएगा। 

एक शिक्षक ने बदल दी स्कूल की 

school - फोटो : amar ujala
कर्णप्रयाग में गैरसैंण ब्लाक का दुर्गम प्राइमरी स्कूल स्यूणी मल्ली पब्लिक स्कूलों को भी मात दे रहा है। इस गांव में सड़क नहीं है लेकिन यहां के प्राइमरी स्कूल के बच्चे फर्राटे से साइकिल चलाते हैं। कक्षा तीन में पढ़ने वाला बच्चा भी कंप्यूटर की जानकारी रखता है। यही नहीं, लोक संस्कृति के क्षेत्र में भी नन्हें विद्यार्थी जिला और प्रदेश स्तर पर प्रतिभाग कर चुके हैं।

सड़क से करीब पांच किमी की खड़ी चढ़ाई पर स्थित स्यूणी मल्ली प्राइमरी स्कूल में 35 बच्चों को पढ़ाने के लिए दो अध्यापक तैनात है। इनमें प्रधानाध्यापक घनश्याम ढौंडियाल को सोमवार को शिक्षक दिवस पर गवर्नर अवार्ड से सम्मानित किया जा रहा है। वर्ष1999 से यहां तैनात ढौंडियाल के स्कूल के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए ही उन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।

उन्होंने सबसे पहले स्कूल भवन को दुरुस्त करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने खर्चे से इसका रंग रौगन कराया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रति बच्चों के उत्साह को देखते हुए संगीत सामग्री और ड्रेस आदि की व्यवस्था की। यहां के बच्चे हर क्षेत्र में आगे बढ़ें, इस उद्देश्य से उन्होंने एक साइकिल खरीदकर स्कूल में बच्चों को साइकिल चलानी भी सिखाई। उनकी प्रेरणा से ही गैरसैंण के श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम ने इन बच्चों के लिए दो साइकिलें उपलब्ध कराई हैं। ब्यूरो

15 बच्चे कर चुके हैं राज्य स्तर पर प्रतिभाग     
प्राइमरी स्कूल स्यूणी मल्ली के 15 बच्चे 10 वर्षों में विभिन्न स्कूली प्रतियोगिताओं में राज्य स्तर पर प्रतिभाग कर चुके हैं। इन बच्चों ने दौड़, कबड्डी और खो-खो में हिस्सा लिया है। इसके अलावा इस स्कूल से पढ़े 10 बच्चे सेना में सेवाएं दे रहे हैं। जबकि दो बालिकाएं नवोदय में अध्ययनरत हैं।   

आदिवासी बच्चों के लिए होरीलाल को दुर्गम भी मंजूर

विद्यालय - फोटो : dummy picture
चंपावत के होरीलाल के लिए रविवार का मतलब छुट्टी नहीं है। इस दिन भी वे बच्चों को पढ़ाते हैं। उन बच्चों को जो आदिम जाति वनरावतों के हैं और जिनके यहां पढ़ाई लिखाई को लेकर कोई रुझान नहीं है। वनरावतों के इस बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें दुर्गम में रहने से भी परहेज नहीं है। अति दुर्गम स्कूल में उनकी लगन का ही सबब है कि पहली बार कोई वनरावत आठवीं से आगे पढ़ाई के लिए चंपावत आने की हिम्मत जुटा पाया।

मुख्यालय से 51 किलोमीटर दूर खिरद्वारी राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए 12 किमी का फासला पैदल तय करना होता है। इस अति दुर्गम स्कूल में बरेली के होरी लाल 2004 से सेवा दे रहे हैं। गांव में बिजली नहीं है और यह कसक होरी लाल के मन में है। इस कारण बच्चों को कंप्यूटर नहीं सिखाया जा सकता। रविवार को वनरावत बच्चों को सामान्य ज्ञान, स्वास्थ्य की जानकारी दी जाती है।

ग्राम प्रधान लक्ष्मी देवी के मुताबिक होरी लाल की इस पहल से 2014 में पहली बार कोई वनरावत बच्चा आठवीं से आगे की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर निकलने की हिम्मत कर सका। चंपावत में महेश रजवार का नौंवी में दाखिला कराया गया। होरी लाल ने अब तक की 24 वर्ष की सेवा मुख्यधारा से कटे इलाकों में ही दी है।

ब्लॉक समन्वयक श्याम सिंह लडवाल के मुताबिक होरी लाल को कुमाऊंनी बोलनी नहीं आती थी। बच्चों से जुड़ाव के लिए उन्होंने साथी शिक्षकों से कुमाऊंनी बोलना भी सीखा।

शिक्षक द्वारा की गई सेवा
विद्यालय का नाम        सेवा की अवधि      पैदल दूरी (किमी में)
खटोली                       2 साल                13
पचनई                        4 साल                 9
झालाकुड़ी                     2 साल                 3
दियूरी                          6 साल                7
खिरद्वारी                     12 साल              12
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डॉ. प्रमोद के लिए उत्तराखंड ही है अब कर्मभूमि

- फोटो : Demo pic
उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के बुधवाई गांव के डॉ. प्रमोद कुमार श्रोत्रिय को अब उत्तराखंड अपनी जन्मभूमि से ज्यादा प्यारी है। उत्तर प्रदेश जाने का विकल्प ठुकरा कर अब श्रोत्रिय उत्तराखंड को अपनी कर्मभूमि बना चुके हैं।

1987 में अल्मोड़ा जिले के कोटाचामी राजकीय हाईस्कूल में पहली नियुक्ति हुई तो उनको लगा कि पहाड़ पर कैसे नौकरी करेंगे। चार साल बाद नई तैनाती मिली भी तो पिथौरागढ़ जिले के धारचूला तहसील में दूरस्थ जीआईसी खेला में। वर्ष 2000 में राज्य बना तो उत्तर प्रदेश जाने का मन बनाया था पर मौका नहीं मिल पाया।

2015 में फिर से उत्तर प्रदेश का विकल्प मिला पर श्रोत्रिय इस बार इसमें शामिल नहीं हुए। अब उत्तराखंड उनकी कर्मभूमि है। उनको हिंदी शिक्षण के लिए शिक्षणश्री, सारस्वत साहित्य सम्मान, भारतीय वांङमय सम्मान, साहित्य प्रभा राष्ट्र गौरव सम्मान, साहित्य वैभव सम्मान, काव्यश्री समेत कुल 37 सम्मान भारत में और एक नेपाल में मिल चुका है। श्रोत्रिय खुद पुरस्कारों के पीछे भागना ठीक नहीं मानते।

इस शिक्षक  का दूसरा रूप भी है। जीआईसी कनालीछीना में भी वह गरीब बच्चों को स्कूल ड्रेस और किताबें बांटते रहते हैं। उनकी पुकार, फुहार, पुनर्वास, नागकन्या, विदुरनीति शीर्षक से कई पुस्तकें प्रकाशित हो गई हैं।

बबीता गुप्ता ने कठपुतलियों से सिखाई बच्चों को अंग्रेजी
काशीपुर में राजकीय प्राथमिक विद्यालय हिम्मतपुर में तैनात शिक्षिका बबीता गुप्ता का ही जज्बा है कि यह धारणा टूट पाई कि सरकारी स्कूल में बच्चे अंग्रेजी में कमजोर होते हैं।

पाठ्यक्रम के अलावा अंग्रेजी शिक्षण में कठपुतली के प्रयोग करने में भी बबीता ने हिचक नहीं दिखाई। फरवरी में उन्होंने शिक्षिका डॉ. ज्योति गांधी से कठपुतली बनाकर बच्चों को पढ़ाने के तरीके सीखे।

यहां बच्चे ए फॉर एप्पल की बजाय ए फॉर अमूल, बी फॉर बटर, सी फॉर क्रेक्स, आर फॉर राइस पढ़ते हैं। यहां बच्चे अंग्रेजी में अंताक्षरी भी खेलते हैं। रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म, बैंक विड्रॉल फॉर्म भी भरते हैं।
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