नैनीताल में एक मृदा परीक्षण केंद्र भी स्थापित किया गया
ये श्यामखेत (घोड़ाखाल), हरी नगरी (बागेश्वर), कौसानी, चंपावत और भटौली (चमोली) में स्थापित हैं। नैनीताल में एक मृदा परीक्षण केंद्र भी स्थापित किया गया है जहां किसान अपने खेतों की मिट्टी चेक कराकर यह पता कर सकते हैं कि उनकी भूमि चाय उत्पादन के लिए कितनी उपयुक्त है। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड इस समय घाटे में चल रहा है। इस व्यापार में श्रमिकों का भुगतान एक बड़ी लागत है। अब सरकार की सहायता से चाय के बगानों में होने वाले काम को वीबी जी राम जी योजना से जोड़ने की योजना पर काम चल रहा है।
उत्तराखंड में पैदा होने वाली चाय की क्वालिटी किसी भी दूसरी जगह की चाय से कमतर नहीं है। अपनी ताजगी और बेहतर स्वाद के कारण यह धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय हो रही है। टी टूरिज्म की योजना अमल में आने पर चाय की खेती किसानों की आर्थिक समृद्धि के द्वार खोलेगी। महेंद्र पाल सिंह, निदेशक, उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड
कितनों को मिल रहा रोजगार
राज्य के करीब चार हजार परिवार चाय की खेती से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। चाय की खेती से उत्तराखंड में प्रति वर्ष लगभग सात लाख मानव दिवस रोजगार का सृजन किया जा रहा है। इस रोजगार का सबसे बड़ा हिस्सा (80 प्रतिशत) महिलाओं का होता है जो खेतों को तैयार करने से लेकर पत्तियों को चुनने तक का काम करती हैं। किसान अपनी भूमि को राज्य के चाय विकास बोर्ड को 15 वर्षों के लिए लीज पर देते हैं। इसके बाद वे स्वयं इसमें काम करके मजदूरी भी प्राप्त करते हैं। इस तरह उन्हें अपनी भूमि से दोहरा लाभ होता है। लेकिन बोर्ड किसानों को अपनी भूमि पर स्वयं चाय उत्पादन के लिए प्रोत्साहन दे रहा है। इसके लिए बोर्ड कई तरीके से किसानों की सहायता कर रहा है। चाय की पौध लगाने के बाद करीब 11 वर्षों में उनसे चाय की पत्तियां मिलने लगती हैं। अभी करीब चार वर्ष हरी पत्तियां लेकर बोर्ड किसानों का खेत उन्हें वापस कर रहा है।
बोर्ड को घाटे से उबारना चुनौती
उत्तराखंड में पैदा हो रही चाय का स्थानीय स्तर पर बहुत कम खपत हो रही है। होटलों के द्वारा पर्यटकों को स्थानीय चाय का जायका बेहतर तरीके से पेश किया जा रहा है जिससे लोकप्रियता बढ़ रही है। लेकिन राज्य के कुल चाय उत्पादन का अधिकतर हिस्सा कोलकाता की चाय थोक मंडी में पहुंचाया जा रहा है जहां इसको देशी-विदेशी खरीदार मिल रहे हैं। कई बड़ी चाय वितरक कंपनियां इन मंडियों से चाय की बेहतर क्वालिटी की खरीद कर उसकी पैकेजिंग कर अपने नाम से बेच रही हैं। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड को घाटे से उबारना एक बड़ी चुनौती है। किसानों को चाय के बगानों को अपने स्तर पर संचालित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यदि किसान अपने खेतों में सीधे तौर पर चाय का उत्पादन करने लगेंगे तो इससे उनकी आर्थिक समृद्धि का रास्ता खुलेगा। बोर्ड इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ कई योजना पर काम कर रहा है।
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जैविक चाय ने खींचा दुनिया का ध्यान
कारखानों में पैदा हो रही खाद के उपयोग से पैदा हो रहे खाद्यान्न का नुकसान दुनिया को समझ में आने लगा है। अब पूरी दुनिया में जैविक और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की बातें हो रही हैं। उत्तराखंड में चाय की खेती भी जैविक होने की राह पर है। इस समय करीब 450 हेक्टेयर में जैविक चाय का उत्पादन किया जा रहा है। जैविक खेती का रकबा लगातार बढ़ाया जा रहा है। ग्रीन टी का बढ़ता प्रचलन किसानों के लिए यह बेहतर अवसर लेकर आया है। जैविक खेती के माध्यम से पैदा हो रही चाय को थोक बाजार में पारंपरिक चाय से अच्छे दाम और बेहतर खरीदार मिल रहे हैं।