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खतरे में है कैंसर से बचाने वाली दवा

Fri, 04 Jul 2014 03:45 PM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
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कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारी के इलाज में जान बचाने वाला औषधीय वृक्ष हिमालय यू (थुनेर) खतरे में है।
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दवाओं में प्रयोग बढ़ने से इस पेड़ का अंधाधुंध दोहन इसे विलुप्ति की कगार पर ले आया है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस वृक्ष को रेड लिस्ट में शामिल कर लिया गया है।

हिमालयन एरिया के जम्मू एंड कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और नॉर्थ ईस्ट में यह पेड़ बहुतायत में पाया जाता था।

जीवनरक्षक साबित होने के बाद हुआ खूब दोहन

वर्ष 1991 में रिसर्च में यह बात सामने आई कि इसकी छाल से निकलने वाला रसायन ‘टैक्सॉल’ ब्रेस्ट कैंसर में जीवनरक्षक साबित हो सकता है।

इसके बाद यह पेड़ साल दर साल दोहन का शिकार होता चला गया। हाल ही में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आफ नेचर एंड नेचरल रिर्सोसेज (आईयूसीएन) के बाद वर्ल्ड कंजर्वेशन यूनियन(डब्ल्यूसीयू) ने इसे रेड लिस्ट में शामिल किया है।

इंडियन काउंसिल फॉर फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन(आईसीएफआरई) ने भी इस पेड़ को खतरे की श्रेणी में बताया है। भारतीय वन परिषद का कहना है कि इसे बचाने के लिए ठोस कदम न उठाए गए तो यह इतिहास बन जाएगा।

अलग-अलग नामों से है पहचान

हिमालयन यू के अलावा इस पेड़ को अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है।

उत्तराखंड में इसे थुनेर, उर्दू में जरनब, कश्मीरी में टैक्सस, अरबी भाषा में टालिस्फार, बंगाली में बिर्मी, तालिश पात्रा, भाडा गेटेला, चीनी भाषा में जू शान, अंग्रेजी में यू, फ्रेंच में इफ कॉम्यून, जर्मन में ईब, ईफे, इबेनबॉम, कांटेलबॉम, टैक्सबॉम, गुजराती में गेठेला बार्मी, हिंदी में तालिश पात्र, तालिश पत्ता के नाम से जाना जाता है।

संस्कृत में इसे मंधुपूर्णी, तालिशपात्र, सुकपुष्पा नाम दिए गए हैं।

पत्तियों से भी निकाल रहे टैक्सॉल
इस पेड़ पर शोध कर चुके आईसीएफआरई के वरिष्ठ वैज्ञानिक और चिकित्सा पौधों के विशेषज्ञ डॉ. एके शर्मा ने बताया कि पहले केवल छाल से ही टैक्सॉल निकाला जाता था लेकिन अब पत्तों का भी इस्तेमाल होने लगा है।

इस वजह से तेजी से यह पेड़ खत्म हो रहा है।
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आसानी से पैदा नहीं होता थुनेर

इस पेड़ का बीज काफी सख्त होता है। बीज बोने के बाद कई महीनों में इसके उगने की उम्मीद महज आठ प्रतिशत होती है।
आईसीएफआरई के वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी कटिंग से नया पेड़ बनाने की प्रक्रिया भी बेहद मुश्किल है।

डॉ. शर्मा के मुताबिक इस पेड़ को बचाने के लिए टिशू कल्चर लैब में इसके डीएनए से नई और जल्द विकसित होने वाली पौध तैयार की जानी चाहिए।

हिमालयन यू पर हमने काफी शोध किया है। राज्य वन विभाग के पास चकराता स्थित देवबन में यह पेड़ मौजूद है। वहां इसके संरक्षण के लिए शोध कार्य चल रहे हैं। इसके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहल की जरूरत है।
- डॉ. एके शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं मेडिसनल प्लांट विशेषज्ञ
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