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एवरेस्ट जीत चुकीं, अब मानवता जीतना हैं

Fri, 03 Jan 2014 12:23 PM IST
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
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बेटियों को बोझ समझने वाले लोगों के लिए ताशी-नुंग्शी मिसाल बन गई हैं। इन दोनों जुड़वां बहनों ने एवरेस्ट फतह कर अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊंचा किया है।
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पर्यावरण बचाने का संदेश
बकौल ताशी-नुंग्शी पर्वतारोहण के माध्यम से वह हर आम-ओ-खास तक पहाड़, पर्यावरण बचाने का संदेश पहुंचाना चाहती हैं। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संगठन (यूएनओ) के साथ जुड़कर आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कार्य करना उनका लक्ष्य है, ताकि वह मानव सेवा कर सकें। आपदा में जनहानि को कम कर सकें।

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19 मई, 2013 को एवरेस्ट की विजय के साथ ही बाल दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात को अपने लिए खास मानती हैं ताशी-नुंग्शी। इन दोनों बहनों के उनके जोहड़ी स्थित आवास पर बात हुई तो उन्होंने एवरेस्ट तक पहुंचने और परिजनों के संघर्ष की कहानी बयां की।
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12वीं में कॉमर्स, मैथ्स पढ़ने वाली ताशी-नुंग्शी ने माउंटेनियरिंग का ककहरा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (निम) में सीखा। निम के कर्नल शमशेर सिंह थापा इन दोनों की प्रतिभा के कायल थे।

ख्वाब को अपनी मां से साझा किया
तकरीबन तीन साल हुए, जब दोनों बहनों ने एवरेस्ट फतह करने की सोची तो सबसे पहले इस ख्वाब को अपनी मां से साझा किया। सुनकर मां की सांस जैसे रुक गई।

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पहले-पहल उन्हें बेटियों की बातें सुन बेचैनी हुई, लेकिन कुछ बच्चियों के पिता कर्नल वीरेंद्र मलिक ने समझा और कुछ जब उन्होंने इन दोनों की इच्छा और जज्बा देखा तो अपने डर को किनारे रख दोनों को इसके लिए इजाजत दे दी।

पैसे नहीं थे, गोल्ड लोन लिया
अभियान की तैयारी तो शुरू हो गई, लेकिन इसके लिए लाखों रुपये की जरूरत थी। आखिर बेटियों का ख्वाब पूरा करने के लिए मां को अपने गहनों का ख्याल आया। उन्होंने इनकी बिना पर बैंक आफ बड़ौदा से तकरीबन साढ़े छह लाख रुपये का गोल्ड लोन लिया।
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