ये था मामला
दरअसल, 2016-17 में नगर निगम क्षेत्र का विस्तार हुआ और करीब 72 गांव निगम क्षेत्र में जोड़े गए। नए परिसीमन के बाद जब 2018 में नगर निगम का बोर्ड गठित हुआ तो बोर्ड बैठक में पार्षदों ने बात उठाई कि नगर निगम क्षेत्र बड़ा हो गया है और क्षेत्र में सफाई की दिक्कत आ रही है। ऐसे में सफाई कर्मचारियों की भर्ती होनी चाहिए।
इसके बाद बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पास कर हर वार्ड में एक स्वच्छता समिति का गठन किया गया। हर वार्ड में करीब 10-10 पर्यावरण मित्र भर्ती किए गए। इसमें घोटाले की नींव इस बात से रख दी गई कि इन पर्यावरण मित्रों को तनख्वाह खाते में न देकर उनको नकद में दी जाएगी।
दिसंबर 2023 में जब नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल पूरा हुआ तो प्रशासक के हाथ नगर निगम की कमान आई। इसके कुछ महीनों में ही इस घोटाले से पर्दा उठना शुरू हो गया। तत्कालीन डीएम-प्रशासक सोनिका ने इस मामले की जांच तत्कालीन सीडीओ झरना कमठान को सौंपी। जांच में पाया गया कि 99 के करीब ऐसे पर्यावरण मित्र हैं, जिनके नाम से नगर निगम से हर महीने तनख्वाह जारी होती रही, लेकिन इनका धरातल पर कहीं अता पता नहीं मिला। जांच डीएम को सौंप दी गई। तब से लेकर आज तक यह मामला फाइलों में दबकर रह गया।
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हरिद्वार घोटाले के बाद हरकत में आया निगम
पिछले एक साल से यह फाइल कागजों में दबी हुई थी, लेकिन अभी हाल ही में प्रशासक कार्यकाल में हरिद्वार नगर निगम में किए गए भूमि घोटाले का सच सामने आया तो मुख्यमंत्री ने कड़ी कार्रवाई करते हुए डीएम सहित कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया। माना जा रहा है कि इसी कार्रवाई के डर से नगर निगम में देहरादून में हुए इस करीब आठ करोड़ रुपये के घोटाले की यह फाइल भी बाहर आ गई। हरिद्वार में कार्रवाई के कुछ ही दिन बाद नगर निगम देहरादून के अधिकारियों ने भी इस मामले में दबी हुई फाइल को निकालकर मुकदमा दर्ज कराया है।