देवभूमि पर ही सूर्य देवता की कम मेहरबानी! जी हां यह सच है। अन्य राज्यों की अपेक्षा यहां सूर्य के 365 दिनों में सिर्फ 240-260 दिन ही दर्शन हो पाते हैं। सौर ऊर्जा विशेषज्ञों की मानें तो हाइड्रो पावर के विकल्प के रूप में मानी जा रही सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने में यह प्रमुख दिक्कत है।
सूर्य की जितनी ऊष्मा जमीन पर आती है उसको सौर ऊर्जा के रूप में परिवर्तित करने में भी मुश्किल आ रही है। देश में अभी तक ऐसे सोलर पैनल नहीं बन पाए हैं जो पूरी ऊष्मा को अवशोषित कर सकें। ऊपर से तेजी से बढ़ रहा पर्यावरण प्रदूषण इस रोशनी और जमीन के बीच दीवार बन रहा है। जिससे मुश्किल से छनकर धूप नीचे तक आ पा रही है।
इन राज्यों में सूर्य दर्शन की स्थिति
राजस्थान-280 दिन, दिल्ली-275 दिन, मुंबई-272 दिन, गुजरात-270 दिन, उप्र-265 दिन।
16 प्रतिशत रोशनी ही आ पाती है उपयोग में
सूर्य की रोशनी से बिजली बनाने की प्रक्रिया में भी कम सफलता मिल पाती है। जो भी सोलर पैनल भारत में उपलब्ध हैं, उनमें कुल मिलने वाली रोशनी का मात्र 16 से 18 प्रतिशत ही बिजली बनने में प्रयोग हो पाता है। करीब तीन साल पहले तक यह प्रतिशत मात्र 12-13 ही था। कुछ इजाफा जरूर हुआ है। लेकिन विकसित देशों की तुलना में यह काफी कम है। अमेरिका, चीन और जापान, जर्मनी आदि में रोशनी के सोलर पैनल में अशोषित होने की मात्रा 25 प्रतिशत तक है।
उत्तराखंड में बादलों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक समय तक रहती है। ठंड के मौसम में यहां पर पश्चिमी विक्षोभ असर आने से भी इसमें कमी आ जाती है।
---आनंद शर्मा निदेशक मौसम विभाग