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गुरबत में लड़के का वेश बदलकर की मजदूरी, हिम्मत नहीं हारी और छू लिया आसमान

Sun, 10 Mar 2019 10:21 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क/अमर उजाला, मसूरी
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टीना मेना - फोटो : अमर उजाला
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अगर आप किसी काम को करने के लिए ठान लें तो कोई भी आपको नहीं रोक सकता। किस्मत भी उसी का साथ देती है जो हौसला रखते हैं। अगर आप हिम्मत के साथ आगे बढ़ेंगे तो रास्ते अपने आप बन जाएंगे। यह कहना है अरुणाचल प्रदेश की पहली पर्वतारोही बनने का गौरव प्राप्त करने वाली टीने मेना का।

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एक कार्यक्रम में मसूरी पहुंची टीने ने अपने संघर्ष और सफलता पाने के अनुभव साझा किए। उन्हें साइकिलिंग, तैराकी आदि में भी महारत हासिल है। आज वे महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं। टीने मेना का जन्म वर्ष 1986 में गांव ईचाली में निर्धन परिवार में हुआ था। यह इलाका चीन की सीमा से कुछ ही दूरी है।

साइकिलिंग से शुरू हुआ सफर

टीने ने अपने अनुभवों का साझा करते हुए बताया कि साइकिलिंग से उनका सफर शुरू हुआ था। अपने बुरे समय को याद कर टीने आज भी सहम जाती हैं। जब आजीविका का कोई बड़ा साधन नहीं था। वह बताती हैं कि उनके इलाके में महिलाओं का काम करना बहुत कठिन होता है।

इसलिए वर्ष 2002 में कुछ दिन लड़के का वेश बदलकर मजदूरी की थी। गरीबी की बेड़ियां भी टीने का हौसला नहीं तोड़ पाई। तमाम दिक्कतों के सागर को पार कर उन्होंने एक दिन कामयाबी का आसमान छू ही लिया। वर्ष 2007 में ट्रेनिंग लेने के बाद उन्हें 9 मई 2011 को फर्स्ट नॉर्थ ईस्ट व फर्स्ट अरुणाचली वूमेन माउंटेनीयर बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
 
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अरुणाचल में आज भी सहकारिता का भाव

वर्ष 2011 में माउंट एवरेस्ट फतह करने के कुछ समय बाद उनके घर में भीषण आग लग गई थी। जिसमें सभी सर्टिफिकेट व अन्य जरूरी दस्तावेज जल गए थे। आसपास के लोगों ने मदद की और घर बनाने में भी हाथ बटाया। जिसके बाद दोबारा जिंदगी पटरी पर लौट आई। उन्होंने बताया कि अरुणाचल में आज भी सहकारिता का भाव है। जब भी किसी पर विपदा आती है तो सभी लोग पीड़ित की मदद करने के लिए आगे आ जाते हैं। उन्होंने बताया कि एवरेस्ट फतह करने के बाद गांव के लोगों में उनके लिए और सम्मान बढ़ गया।

वे लोगों को खासकर युवाओं को माउंटेन के बारे में जानकारी देती हैं। साथ ही पहाड़ी रास्तों पर चलना, जंगल में बोलना, नदी में तैरना आदि सिखाती हैं। उन्होंने बताया कि अरुणाचल प्रदेश सरकार ने एवरेस्ट फतह करने के बाद उन्हें नौकरी देने की घोषणा की थी जो आज तक पूरी नहीं हुई। अब वे अपना ड्राइंग ईको कैंप व दमिस्मी हिल्स ट्रैकिंग कंपनी चला रही हैं, जिसमें वे युवाओं को माउंटेनरिंग, राफ्टिंग आदि का प्रशिक्षण देती हैं। अब तक उनके संस्थान से करीब ढाई हजार से अधिक युवा प्रशिक्षण ले चुके हैं।
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