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पढ़ें, ऐसी बेटियों की कहानी जिन पर समाज को है गर्व

Sat, 31 Jan 2015 01:38 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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मो. यामीन अंसारी/ अमर उजाला, सितारगंज
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आज अमर उजाला आपको ऐसी बेटियों से मिलवाएगा, जिन्होंने मुफसिली में जीकर अपनी मंजिल पाई और दूसरों का सहारा बनीं।

परिवार पर कोई मुसीबत आए तो बेटियां सबसे पहले जिम्मेदारी उठाने को तैयार रहती हैं। पुलिस की जांबाज सिपाही शबिया खातून मुस्लिम समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। लड़कों को ही घर का चिराग समझने वाले समाज को वे सच्चाई का आइना दिखा रही हैं।

पिता की मौत के बाद सितारंगज की शबिया के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। शबिया अपने सातों बहन-भाइयों को बेहतर शिक्षा दिला रही हैं। भाई-बहनों के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने अब तक निकाह भी नहीं किया।
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सितारगंज से करीब छह किमी दूर नकहा गांव की रहने वाली शबिया खातून बेहद गरीब परिवार से हैं। उनके पिता छोटे बख्श मजदूर थे। शबिया ने घर के पास ही स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय से कक्षा पांच तक की शिक्षा ग्रहण की।

सिसैया के जूनियर हाईस्कूल से आठवीं के बाद सितारगंज राजकीय बालिका इंटर कॉलेज से हाईस्कूल किया और फिर बरा के जीजीआईसी से 12वीं की शिक्षा ली।

इसके बाद 16 दिसंबर 2007 को शबिया खातून पुलिस में भर्ती हुई और कांस्टेबल के पद पर रहकर खटीमा डिग्री कॉलेज से बीएससी एवं बीएसएम डिग्री कालेज रुड़की से राजनीति शास्त्र विषय से एमए की प्राइवेट डिग्री ली। शबिया की पहली पोस्टिंग हरिद्वार की लक्सर कोतवाली में हुई। इसके बाद सिविल लाइन कोतवाली रुड़की में एक साल रहीं।
2012 से शबिया रुड़की के महिला हेल्पलाइन में तैनात हैं। शबिया के पुलिस में भर्ती होने के बाद 19 नवंबर 2009 को उनके पिता की मौत हो गई। इसके बाद से परिवार की जिम्मेदारी शबिया संभाल रही हैं।

शबिया ने बताया कि उनकी बहन रूबी ने खटीमा से बीए, रुकइया ने एमए की डिग्री ली है और उससे छोटी रजिया सिसैया के डीएस पब्लिक स्कूल में इंटर की छात्रा है। भाई फिरोज अहमद वर्ष 2012 में पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुआ था और वर्तमान में नैनीताल में तैनात है।

शबिया की मां अनीसा ने बताया कि उनका सपना था कि बेटियां नाम रोशन करें। जिसे शबिया ने पूरा कर दिखाया है। उनका कहना है कि बेटियों को गरीबी से दोचार होते हुए पढ़ाया और लोगों के ताने भी सुने। पर, आज बेटी को वर्दी में देख सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है।

हालात आड़े आए तो हालात बदल दिए

रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून

जिस मनरेगा योजना की बात पर घपले-घोटालों की बात होती है उसी योजना से सारड़ी गांव की ग्राम प्रधान मखतोरी देवी ने गांववालों की तरक्की की राह निकाली है। दुर्गम क्षेत्र के गांव में हालात आड़े आए तो उन्होंने हालात बदल दिए।

मनरेगा से गांव के हर व्यक्ति को जोड़ा तो तालाब बने, गूल बने, सिंचाई के साधन जुटे। हर घर खुशहाल हो, गांव बुलंद पायदान पर पहुंचे। इसी जुनून ने आज मखतोरा देवी को उत्तराखंड की पहली महिला बना दिया है जिसे दो फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मानित करेंगे।

मखतोरा देवी के हौसले से प्रदेश भर में चर्चा में आया सारड़ी गांव कालसी ब्लाक से तकरीबन 18 किमी दूर दुर्गम इलाके में आबाद है। इस गांव से मखतोरा देवी वर्ष 2014 में निर्विरोध प्रधान चुनी गई थीं। इसके पहले वह वर्ष 2002 में प्रधान रही थीं।
वर्ष 2008 के चुनाव में उनकी बेटी सीमा ग्राम प्रधान बनी थी। कहने को तो वह कक्षा पांच पास हैं। बताती हैं कि तब गांव के हालात ऐसे न थे कि आगे पढ़ पाती। इसी ने गांव की स्थिति बदलने का हौसला दे दिया।

उनका कहना है कि योजनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करने का अपना मिशन बना लिया है। सरकार योजनाएं बनाती हैं तो लोग उसका लाभ उठाएं। व्यक्ति की तरक्की होगी तो गांव का भी तो विकास होगा। सारे लोग मनरेगा से जुड़े तो काम दिखने लगा।

मखतोरा देवी बड़ी शान से बताती हैं कि गांव में तालाब बन गए हैं। गूल बन गए। खेतों की सिंचाई की व्यवस्था हो गई। इससे लोगों के लिए आसानी हो गई है।

बताती हैं कि प्रधान बनने के बाद 30 लाख का काम करा चुकी हैं। इस संबंध में जिला विकास अधिकारी सुशील मोहन डोभाल का कहना है कि मखतोरा देवी का काम देखकर पुरस्कार के लिए उनका प्रस्ताव भेजा गया था।
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मुश्किलों में पढ़ी, मुफलिसों को पढ़ा रही

हेमवती नंदन भट्ट/ अमर उजाला, ऋषिकेश

उसने अपने अनपढ़ माता-पिता के जीवन में शिक्षा का उजियारा फैलाया। मां को पांचवीं तक की शिक्षा दी, जिससे उसकी वह सामान्यतौर पर पढ़लिख लेती हैं। पिता अंगूठा लगाते थे, अब हस्ताक्षर कर लेते हैं। शिक्षा से महरूम गरीब बच्चों के जीवन में आखर ज्ञान भरने का काम वह पिछले पांच साल से कर रही है।

अब तक वह करीब 300 बालक-बालिकाओं को निशुल्क शिक्षा दे चुकी है। सोनी नेशा का बचपन अभावों में बीता। घर के हालात ऐसे थे कि उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए कक्षा तीन से दसवीं तक फैक्ट्री में काम करना पड़ा।

काम करने के साथ ही वह पढ़ाई भी करती रही। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। पिता डेयरी में दूध निकालने का काम करते हैं और मां लोगों के घरों में काम करती है।

12वीं पास करने के बाद सोनी कोचिंग सेंटर चला रही है, जहां गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देती है। 10वीं कक्षा से सोनी मोहल्ले के छोटे बच्चों को निशुल्क पढ़ाने लगी थी। 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद कोचिंग क्लास संचालित कर उन्हें पढ़ा रही है।

कोई बच्चा शिक्षा से न रहे वंचित
सोनी बताती है कि वह ऐसे बच्चों खासकर लड़कियों की तलाश करती है जो किसी कारण से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित करती है और तालीम देती है।

बालिकाओं, महिलाओं को निशुल्क कंप्यूटर शिक्षा देने के लिए सोनी ने पहले घर-घर संपर्क किया। अब केंद्र स्थापित होने के बाद कई लोग स्वयं मदद के लिए आगे आए।
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