फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजजात की वो कहानियां, जो कही नहीं जाती

Wed, 20 Aug 2014 11:36 PM IST
कांसुवा से सुधाकर भट्ट
विज्ञापन
विज्ञापन
कथाओं, किवदंतियों और मिथकों के प्रदेश में नंदा की एक नहीं कई कथाएं हैं। कुछ खुलकर गाई जाती हैं तो कुछ के बारे में दबी जुबान में बात की जाती है।
विज्ञापन


उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित शिवधाम के लिए निकली नंदा इन कथाओं, किंवदंतियों और मिथकों को समेटती हुई आगे बढ़ रही हैं। नंदा के मांगल गीत नौटी से लेकर कांसुवा तक गूंज रहे हैं।

मान्यता के अनुसार मायके से ससुराल कैलास के लिए निकली नंदा की यह यात्रा पहाड़ी महिलाओं की जिंदगी का आईना है जो मायके की मधुर स्मृति समेट, ससुराल के दुख, दर्द और दुश्वारियों को झेलती हैं। देवी होने के बावजूद नंदा उनका प्रतिनिधित्व करती है।
विज्ञापन

राजा के प्रायश्चित से जुड़ी है एक मान्यता

राजजात से जुड़ी एक और मान्यता नंदा को राजा से सीधे नहीं जोड़ती। यह मान्यता दंड के भागी बने राजा के प्रायश्चित की है। नंदा की इस कथा को बैनोली में दबी जुबान में सामने रखा गया।

नंदा से जुड़े मान्यता यह दूसरी धारा भी है, जो नंदा को एक देवी के रूप में स्थापित करती है। नंदा इस क्षेत्र के ईष्ट और मंगल की देवी है, जो रक्षक शिव के पास जा रही है। नंदा का यह स्वरूप अब इस यात्रा का खास आकर्षण है।

आयोजन समिति, नौटी के नौटियाल, 12 थोकी ब्राह्मण, 14 सयाने नंदा के इस स्वरूप को ही आगे बढ़ाने में विश्वास करते हैं।

बैनोली में ही आदिशंकराचार्य का एक पुराना कुंआ है। गांव में नंदा का चौरा है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह पूर्व में सार्वजनिक जगह हुआ करती थी।
विज्ञापन

पहाड़ को आपस में जोड़ती है राजजात

नंदा की छंतोली एक ऐसे संकल्प की ओर भी इशारा करती है, जो राज परिवारों के प्रायश्चित से जुड़ी है। पर आज के समय में नंदा की यह यात्रा एक विराट, सांस्कृतिक, धार्मिक, उत्सव और ऊंचे पहाड़ों के चाल-खाल, बुग्याल की सुध लेने की भी है।

यह किसी को हैरान कर सकता है, नंदा की इस यात्रा में सड़क से दूर हटे गांव ही शामिल हैं। मुख्यधारा से कटे इन गांवों को नंदा इस बारासाला (12 वर्षीय) उत्सव में अपने से ही नहीं, बल्कि नाते-रिश्तेदारों और बाकी देश-दुनिया से भी जोड़ती है।

किसी भी गांव के किसी भी परिवार के यह कोशिश होती है कि जात के लिए वह अपने गांव पहुंच जाए। सामान्य रूप से सूने रहने वाले ये गांव इन दिनों खासे गुलजार हैं। यात्रा जैसे बढ़ती है, तो गांव जैसे अपने सदियों पुराने अंदाज में लौट आते हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें