पिछले कई दिनों से मेयर विनोद चमोली विवादों में हैं। उनकी जुबानी जंग विधायकों, मंत्री के साथ तो चलती ही रहती है, स्मार्ट सिटी मुद्दे पर उनका रुख पार्टी लाइन से हटकर था। गुस्से में आकर उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर भी जुबानी हमले किए। कई कार्यक्रमों का बहिष्कार वह करते रहते हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम से इसलिए लौट आए कि उन्हें आयोजकों ने पहचाना नहीं।
मेयर अपनी गाड़ी गेट से ही मोड़कर वापस आ गए थे। पार्टी नेताओं, अफसरों, कर्मचारियों से उनकी भिड़ंत आम है। उनके व्यवहार से भाजपाई कई बार नाराज हो जाते हैं। इधर, मेयर इस पर रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय और आक्रामक हो जाते हैं। वह कहते हैं कि राजनीति ही नहीं, समाज भी अराजक हो गया है।
शुक्रवार को विकास भवन में मेयर ने जिला पंचायतीराज अधिकारी एमएम खान को न सिर्फ डांटा-फटकारा बल्कि आरोप है कि उन्होंने थप्पड़ मारने तक की धमकी दी। इन घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में अमर उजाला संवाददाता गौरव मिश्रा ने शनिवार को उनसे बातचीत की। इस दौरान उनके तेवर वैसे ही थे, जिस पर सवाल उठ रहा है कि आखिर मेयर को इतना गुस्सा क्यों आता है? उनसे जो भी बातचीत हुई, यहां ज्यों की त्यों पेश है।
'गुस्से में नहीं रहता, सिर्फ रिएक्ट करता हूं'
शुक्रवार को विकास भवन में आपने डीपीआरओ को थप्पड़ मारने की धमकी दी, क्यों?
मैंने थप्पड़ मारने की धमकी दी ही नहीं। डीपीआरओ एमएम खान के सुनने में गलती हुई। जब मैं बैठक से उठकर जाने लगा तो वह मेरा हाथ पकड़कर रोकने लगे। साथ ही कई बार सामने आकर खड़े हो गए। मेरे कई बार मना करने पर भी जब वह नहीं मानें तो मैंने उन्हें डांट पिलाई। वहां की कमजोर व्यवस्था के लिए मुख्य विकास अधिकारी व डीपीआरओ जिम्मेदार थे। राज्य वित्त आयोग को भी वहां कार्यक्रम नहीं करना चाहिए थे। मेरी नाराजगी, अशिष्टता और अव्यवस्था के खिलाफ थी।
आपको इतना गुस्सा क्यों आता है?
मैं व्यवस्था और अनुशासन को सबसे ऊपर रखता हूं। मुझे कोई शारीरिक या मनोवैज्ञानिक परेशानी नहीं है, जिससे गुस्सा आता हो। अगर कहीं भी अनुशासनहीनता होती है और व्यवस्था दोषपूर्ण होती है तो मैं विरोध करता हूं। अन्याय, अव्यवस्था, अनुशासनहीनता के खिलाफ सकारात्मक गुस्सा आना अच्छी बात है। मैं कुटिल और छल-कपट वाली राजनीति में विश्वास नहीं करता। इसी कारण हमारे देश में अराजकता और अव्यवस्था का राज है। मैं गुस्से में नहीं रहता, सिर्फ रिएक्ट करता हूं।
बदतमीजी के आरोपों पर कहा स्वाभिमान सबसे ऊपर
पहले भी कई बार आप अपनी पार्टी समेत कई कार्यक्रमों का बहिष्कार कर चुके हैं, लोग आप पर बदतमीजी का आरोप लगाते हैं?
जब भी प्रोटोकोल और पद की गरिमा को ठेस पहुंचता है, मैं शांत नहीं रह पाता। आज की राजनीति ओछी हो चुकी है। इसमें बहुत कम साफ सुथरे लोग रह गए हैं। आखिर कब तक आत्मा बेचकर समझौता किया जा सकता है? छिछोरे राजनेताओं ने सार्वजनिक जीवन को तबाह कर दिया है। अगर भाजपा में भी अनुशासनहीनता या मर्यादा का उल्लंघन होता है तो मैं आपत्ति जताता हूं। मेरे लिए स्वाभिमान सबसे ऊपर है। दबकर रहना मेरी फितरत में नहीं है।
इसका मतलब है कि आप किसी का भी अपमान कर देंगे, दूसरे की भी तो इज्जत होती है?
गलत चीजों को देखकर जो रिएक्ट न करे, चुप रहे, साजिश रचे, मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। विरोध करने और अपनी बात को रखने वाला कैरेक्टर खत्म नहीं होना चाहिए। लोग भी अनुशासनहीन और अराजक हो रहे हैं।
आपके खिलाफ अधिकारियों और कर्मचारियों में बहुत गुस्सा है?
सच समझने वाले अधिकारी और कर्मचारी मुझसे नाराज रह ही नहीं सकते। मीडिया को चाहिए वह असलियत समझे और लोगों को समझाए। उत्तराखंड में नौकरशाह तानाशाह हो गए हैं। यह मनमानी करते हैं। सारे कानून एवं नियमों को ताक पर रखते हैं। जब इस तरह की घटना होती है तो अधिकारी को निर्दोष समझा जाता है। जनप्रतिनिधि से आदर्श होने की उम्मीद की जाती है। नौकरशाहों के रवैये और आचरण का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।