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तू करिले अपणो ब्याह देवर, हमरो भरोसो झन करिए...

Wed, 12 Mar 2014 07:22 PM IST
दीपक उप्रेती/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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वैसे तो कुमाऊं में गाए जाने वाले अधिकांश होली गीत ब्रज भाषा के हैं। भक्ति पर आधारित होली गीतों में सूरदास, तुलसीदास, मीरा के भजनों को स्थान मिला है लेकिन कुमाऊं में कई होली गीत ऐसे हैं जिनको स्थानीय बोली में गाया जाता है। इनमें हास्य का पुट मिलता है। श्रृंगार रस से भरे होते हैं। इनमें भक्ति का पुट मिलता है तो प्रेम का भी स्थान दिया गया है।
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कुमाऊं में प्रचलित एक प्रसिद्ध होली गीत में भाभी और देवर के बीच होने वाली ठिठोली को कुछ इस तरह व्यक्त किया गया है-

तू करिले अपणो ब्याह देवर
हमरो भरोसो झन करिए
मैले बुलायो एकलो
तू ल्याये जन चार देवर हमरो भरोसो झन करिए
मैले बुलायो बागा में
तुम आए घरबार देवर हमरो भरोसो झन करिए।

देवर और भाभी पर केंद्रित कई होली गीत यहां प्रचलित हैं। यह सभी गीत स्थानीय बोली में गाए जाते हैं-

तेरो रंगीलो देवर घर आरौछ
त्वै हुणि क्या क्या ल्या रौछ
नाक की नथुली ल्या रौछ
खुचको चप्पल ल्यारौछ
आंख को सुरमा ल्यारौछ
तेरो रंगीलो देवर घर आरौछ।

होली को मस्ती का त्योहार कहा जाता है। इस त्योहार के समय अपार मस्ती और हंसी, मजाक होती है। कुमाऊंनी बोली के एक होलीगीत में एक महिला द्वारा खुद के सौंदर्य का वर्णन कुछ इस तरह किया गया है-

छोटी झन समझे मैं बालमा
जैसी हो रही पूष की पालंग
तैसी हो रही बालमा
जैसी घुटनी काली कमलिया
तैसी हो रही बालमा।

होली पर्व के समापन पर कुमाऊं में आशीष वचन देने के लिए बड़ा ही भावुक गीत गाया जाता है। यह गीत भी पूरी तरह कुमाऊंनी में है। इसमें भगवान राम और कृष्ण को लोग अपने बीच मौजूद पाते हैं। होली के समापन पर आशीष वचन के रूप में गाया जाने वाला यह गीत आज भी खूब प्रचलन में है-
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हो होलक रे
आज को बसंत हो कैका घर
आज को बसंत श्रीकृष्ण बलदेव ज्यू का घर
देखनेर सुणनेर सब जीरया लाख सौ बरीस
आज क बकिया क के नै दोष

भोल बटि कूंलो त मुख लै हाणिया। आज भी इन होलीगीतों का स्थान बना हुआ है। अब देखना है कि बदलते दौर में इन गीतों का अस्तित्व कब तक बना रह सकता है।

स्थानीय बोली के गीत ज्यादा असरदार
कुमाऊंनी होली संगीत पर काम कर रहे डा. पंकज उप्रेती का कहना है कि स्थानीय बोली में गाए जाने वाले गीत ज्यादा असरदार होते हैं। इनमें भावों को सामने लाने की क्षमता अधिक होती है। आम लोग इनका अर्थ तथा आशय समझ लेते हैं। वह कहते हैं कि कुमाऊंनी बोली में तैयार होलीगीतों का संरक्षण किया जाए और कम से कम यह कोशिश की जाए कि फिल्मी होलीगीतों को स्थान न दिया जाए।
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