पहाड़ में गांवों में भी शादी-विवाह की कई पारंपरिक रश्में अब खानापूर्ति हो रही हैं। एक दिवसीय विवाह के बढ़ते चलन के साथ ही मंगल गीत, हल्दी हाथ की परंपरा, भौतिक युग के व्यस्त समय में सिमटती जा रही हैं।
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ऐसे में देवाल ब्लाक के वाण गांव में आज भी सदियों से एक परंपरा निभाई जा रही हैं, जहां दुल्हन को डोली में नहीं बिठाया जाता। बेटी की विदाई हो चाहे पुत्रबधू का गृह प्रवेश, घोड़ी में होता है।
इसलिए नहीं बैठाते डोली में
मान्यता है कि गांव से श्रीनंदा राजजात व लोकजात में मां नंदा डोली में बैठकर गांव से होकर हिमालय के लिए प्रस्थान करती है।
इस दौरान यहां अन्य देवी-देवताओं की डोलियां शामिल होती है। इसलिए बेटी और बहू को डोली में नहीं बिठाया जाता। गांव के बीएस बिष्ट किवदंती का हवाला देते हुए बताते हैं कि एक समय मां श्रीनंदा अपने धर्म भाई लाटू को बिना मिले ही हिमालय की ओर चल दी।
लेकिन आगे दुर्गम रास्ते को पार नहीं कर पाई। इस दौरान लाटू देवता लाल घोड़े में सवार होकर देवी को रास्ता पार कराया था। तभी से यह परंपरा चल रही है।
गांव वालों का है कहना
लाटू गांव का अराध्य देवता है, जो मां नंदा का धर्म भाई है। राजजात में गांव में देवी की सात डोलियां शामिल होती हैं। ऐसे में विवाह के मौके पर बेटी और बधू को डोली में नहीं बिठाया जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है, जिसका निवर्हन गांव की परंपरा का प्रतीक है। घोड़ी का किराया भी 4 सौ से 12 सौ रूपये तक पड़ता है।
-80 वर्षीय काम सिंह बिष्ट, वाण
तीन माह पूर्व मेरी शादी हुई है, मैं भी घोड़ी में बैठकर ससुराल के लिए विदा हुई। बुर्जुगों की इस परंपरा का नई पीढ़ी भी पूरे रीति-रीवाज के साथ पालन कर रही है।
-ममता, विवाहिता बेटी, वाण
सदियों से चली आ रही है परंपरा
श्रीनंदा राजजात का अंतिम बस्ती पड़ाव व देवाल से करीब 40 किमी की दूरी पर स्थित वाण गांव अपनी प्राचीन परंपरा के लिए विशेष है। अपने ईष्ट लाटू और मां नंदा के प्रति भक्ति भावना आज भी यहां देखने को मिलती है।
नगर, कस्बों व अन्य गांवों में जहां शादी-विवाह के मौके पर बहू की विदाई और पुत्रबधू का गृह प्रवेश लक्जरी गाड़ियों व साज-सज्जा से परिपूर्ण डोली में किया जाता है। वहीं इस गांव में दुल्हन घोडी पर सवार होती है।
निवर्तमान ग्राम प्रधान लक्ष्मी देवी और पूर्व प्रधान ऊखा देवी का कहना है कि गांव में सदियों से चली आ रही यह परंपरा उन्हें सुख-समृद्धि भी प्रदान कर रही है।