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मुआवजे की आस में बंद हुईं सिख दंगा पीड़ितों की आंख

Sun, 02 Nov 2014 08:10 AM IST
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
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1984! यह दिन आज भी सिख दंगा पीड़ितों के जख्म हरे कर देता है। देहरादून के पटेलनगर निवासी इकबाल सिंह चड्ढा को ही लें। उनकी रीठा मंडी में कापी किताबों की दुकान थी, जो दंगाइयों ने जला दी।
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इकबाल को मुआवजा मिलना था, लेकिन सरकारी जाल में प्रक्रिया उलझ गई। एक बेटा था, जो प्राइवेट काम कर रहा था। पत्नी की आंखों का आपरेशन होना था, लेकिन पैसा पास नहीं था। साल भर हुआ।

मुआवजे की आस में स्वर्ण कौर ईश्वर को प्यारी हो गई। इस तरह लोग हैं, जो आज इस दुनिया में नहीं। अब केंद्र की तरफ से पांच लाख मुआवजे की बात से कुछ धीरज बंधा है कि जिंदगी पटरी पर लौटेगी।
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अकेले दून जिले में 53 सिख दंगा पीड़ित चिन्हित हैं। इनके अलावा 2010 में डीएम के मांगने पर चार अन्य ने भी आवेदन किया था, लेकिन निर्धारित प्रारूप पर न होने के कारण वह लौटा दिए गए।
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कागजों में ही अटका है मामला

उत्तराखंड के चार जिलों नैनीताल, हरिद्वार, पिथौरागढ़, देहरादून, उधम सिंह नगर के चिन्हित 197 दंगा पीड़ितों के लिए 2009 में 49 लाख रुपए की राशि भी शासन ने स्वीकृत की और अपर सचिव भास्करानंद की तरफ से इस संबंध में चारों जिलों के तत्कालीन डीएम को पत्र भी भेजा गया, लेकिन आज तक मामला कागजों में ही रहा।

यह राशि की थी स्वीकृत
जिला --- राशि (रुपए में)
नैनीताल- 38.30 लाख
हरिद्वार- 5.73 लाख
पिथौरागढ़- 1.74 लाख
देहरादून- 2.98 लाख
उधम सिंह नगर- 0.25 लाख

अब बंधी आस
मुआवजे के संबंध में 2010 से लेकर अब तक छह बैठकों में मैंने खुद यह मुद्दा उठाया है। लेकिन आज तक इस संबंध में कुछ हुआ नहीं। अब केंद्र ने मुआवजे की बात की है तो निश्चित तौर पर अब आस बंधी है। इससे सिख दंगा पीड़ितों के परिवारों को मदद मिलेगी।  
- गुरदीप सिंह सहोता, सदस्य, प्रधानमंत्री 15 सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति
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