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16 दिन चलने वाले महालय श्राद्ध शुरू

Mon, 08 Sep 2014 04:38 PM IST
कौशल सिखौला / अमर उजाला, हरिद्वार
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16 दिन चलने वाले महालय श्राद्ध आज (सोमवार) से शुरू हो रहे हैं। मध्याह्न काल में पूर्णिमा आने के कारण सोमवार चतुर्दशी के दिन पूर्णिमा का श्राद्ध रहा।
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श्राद्ध पक्ष का समापन 24 सितंबर को पितृ विसर्जनी अमावस्या के साथ होगा। इस बार 16 दिन के श्राद्ध 17 दिन में संपन्न होंगे। तिथियों में उलटफेर के चलते अनंत चतुर्दशी सोमवार के दिन उन पुरखों का श्राद्ध होगा जिनका निधन पूर्णिमा के दिन हुआ है।

पूर्णिमा का स्नान नौ सितंबर (मंगलवार) को होगा। उसी दिन प्रतिपदा का श्राद्ध होगा। अगले दिन से प्रतिदिन श्राद्ध पड़ रहे हैं। श्राद्ध पक्ष में जिस तिथि को पितर ब्रह्मलीन हुए हों। उसी तिथि को श्राद्ध तर्पण किया जाता है।
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ऐसे करें प्रसन्न
ज्योतिषाचार्य दीप्ति श्रीकुंज ने बताया कि पितरों के निमित्त तिल, जौ, अक्षत, कुशा, गंगाजल आदि के साथ तर्पण किया जाता है। ब्राह्मण भोजन कराकर पितरों के निमित्त वस्त्र, फल और दक्षिणा दी जाती है। मान्यता है कि ब्राह्मण को भोजन कराने के लिए पलाश और महुए के पत्तों का प्रयोग किया जाए। इन पर भोजन करने से पितृ प्रसन्न होते हैं।

क्रोध न करें
श्राद्ध पक्ष में मध्याह्न तिथि ली जाती है। जो तिथि दोपहर में हो उसी तिथि का श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध करने वाले को पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। यदि क्रोध करेंगे तो पितृ असंतुष्ट हो जाएंगे।

पैसा न हों पास तो बहा दें आंसू
पितरों के ऋण से मनुष्य कभी मुक्त नहीं होता। श्राद्ध करने के लिए पास में पैसा न हों तो भी दक्षिण दिशा की ओर मुख कर आंसू बहा दें, पितृ तृप्त हो जाएंगे। अंजुलि भर जल अंगूठे से होते हुए छोड़ देने अथवा निश्वांस से भी पितरों की तृप्ति का विधान धर्म ग्रंथों में वर्णित है।

पितरों के कनागत केवल भारत में ही नहीं होते बल्कि इन्हीं दिनों पूरी दुनिया मृत पुरखों को किसी न किसी रूप में याद करती हैं। चीन में इसी अश्विन के महीने में नदियों के तट पर जाकर सूखा आटा दक्षिण की ओर मुख कर पुरखों के लिए हवा में उड़ाया जाता है।

जर्मनी में जुलाई-अगस्त में पुरखों की याद में नदियों के तट पर जाकर मोमबत्ती जलाई जाती हैं। थाइलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया में मुस्लिम नागरिक भी पुरखों को सितंबर में नदियों के तट पर जाकर जल देते हैं। इन तीनों देशों के नागरिक उतने लीटर जल चढ़ाते हैं जितने वर्ष पुरखों को मरे हुए बीत गए हों।

रूस और आसपास के तमाम देशों में सितंबर-अक्तूबर में पुरखों को जल देने की परंपरा है। यह जल घरों की छतों पर जाकर चांद को दिया जाता है। मान्यता है कि चांद के माध्यम से यह जल उनके पुरखों तक पहुंचता है। दुनिया के अनेक देशों में किसी न किसी रूप में पितरों को याद किया जाता है। मुख्य बात यह है कि सभी का संबंध जल से जुड़ा हुआ है।

माता का ऋण नहीं उतरता
मान्यता है कि गया और बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करने के बाद पितृगण भगवान के लोक को चले जाते हैं। माता का ऋण अलबत्ता फिर भी नहीं उतरता। श्राद्ध पक्ष में जिसे माता की तिथि याद न हो वह नवमी के दिन माता का श्राद्ध कर सकता है।
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इसके बावजूद माता का ऋण उतरता नहीं। शास्त्रों की व्याख्या है कि माता का ऋण केवल मातृ-गया में माता का श्राद्ध करने से उतर सकता है। मातृ-गया गुजरात में सिद्धपुर के पास पाटन तीर्थ पर स्थित है। जो श्रद्धालु यहां जाकर माता का श्राद्ध कर देते हैं वे मातृ ऋण से मुक्त हो जाते हैं।
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