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इन 46 दवाओं ने बढ़ाया मरीजों का दर्द

Sun, 06 Apr 2014 10:43 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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बीमारी और डॉक्टरों के चक्कर में घनचक्कर बने मरीजों का ‘दर्द’ दवाओं ने बढ़ा दिया है।
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बीती एक मार्च से शेड्यूल एच-1 में रखी 46 दवाओं की काउंटर से बिक्री तो प्रतिबंधित कर दी गई, लेकिन इससे कई एंटीबायोटिक दवाओं की किल्लत पैदा हो गई है।

मसलन, टाइफाइड के मरीजों को दी जाने वाली सेफिजिम, टीबी के मरीजों को दी जाने वाली रेफामपिसिन आदि नहीं मिल रही हैं। इससे टाइफाइड, टीबी के मरीजों को ‘दर्द’ तय है। मिर्गी, न्यूरो, मानसिक रोगियों के लिए भी दिक्कत पैदा हो सकती है।

यह शर्तें, जो बनीं परेशानी

विक्रेता नारकोटिक्स विभाग में आनलाइन रजिस्ट्रेशन कराएंगे। उनकी ओर से दवा कंपनियों को ऑनलाइन आर्डर दिया जाएगा। प्रतिदिन बिक्री का रिकार्ड शाम पांच बजे नारकोटिक्स को भेजा जाएगा।

प्रत्येक तीन माह में बिक्री की सीडी भी नारकोटिक्स को भेजी जाएगी। फुटकर दवा विक्रेताओं को भी मैनुअल रजिस्टर बनाना पड़ेगा।

इसमें दवा लिखने वाले डॉक्टर का नाम, रजिस्ट्रेशन संख्या, मरीज का नाम, दवा का नाम और मात्रा लिखनी पड़ेगी। विक्रेता को अपने पास तीन साल तक यह रिकार्ड रखना होगा।

डायजापाम, नाइट्रिजिपाम जैसी दवाएं तो शेड्यूल एच-1 के तहत पहले ही प्रतिबंधित हैं। एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर जरूर फर्कपड़ा है। अभी रिटेलर पहले का ही स्टाक निकाल रहे हैं।
- सुधीर कुमार जैन, जिला कैमिस्ट एसोसिएशन

यहां दवा बांटने वालों की किल्लत

एक तरफ शेड्यूल एच-1 में आने वाली दवाओं की वजह से मरीज मुसीबत में हैं, दूसरी तरफ दून अस्पताल में फार्मासिस्टों के टोटे पड़े हैं।

दून अस्पताल में दवा लेने वाले हर रोज तकरीबन दो हजार से अधिक मरीज पहुंचते हैं। दवा केंद्र पर केवल तीन फर्मासिस्ट तैनात हैं।

जबकि मानकों के अनुसार एक फार्मासिस्ट केवल सौ ही मरीजों को दवाई दे सकता है। ऐसे में मरीजों के बीच दवा लेने के लिए मारामारी की स्थिति है।

डॉक्टर बनने के चक्कर में आफत...

सुरेखा को हल्की खांसी है, लेकिन वह बजाए डाक्टर को दिखाने के सीधे मेडिकल स्टोर जाकर कफ सीरप खरीद लाईं। दो खुराक लेने के बाद भी कोई उल्लेखनीय असर नजर नहीं आया तो मेडिकल स्टोर जा दवा बदल दी...।

सुरेखा जैसे ही कई लोग हैं, जो खुद डॉक्टर बनने के चक्कर में आफत मोल ले रहे हैं। यह बात दीगर है कि इनकी बदौलत गर्मी में बीमारी के साथ ही दवा का कारोबार भी बढ़ रहा है।

सिरदर्द, उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों के इलाज के लिए लोग बगैर डाक्टर के पास जाने के खुद ही दवा करना बेहतर समझते हैं। एक खुराक से असर नहीं होता तो दूसरा पहर बीतते-बीतते दवा बदल लेते हैं।

अपना इलाज खुद करने वाले इन ‘डॉक्टरों’ की बदौलत गर्मी में होने वाली बीमारियों के दवा बाजार की बढ़ोत्तरी बीते डेढ़ माह में तकरीबन 20 फीसदी बढ़ चुकी है।
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इन दवाओं की बिक्री में उछाल

निमोटाइड पैरासीटामोल
ओफ्लाक्सिसिन टी-जेड
ओबेमाइन टी-जेड
नारफ्लाक्स टी-जेड
ओफ्लाक्स
कांबिफ्लाम

चले आते हैं सीधे दवा लेने
गर्मी में लोग मामूली बीमारियों से परेशान होते हैं तो सीधे दवा के लिए चले आते हैं। यह मौसम बीमार बनाता बहुत जल्दी है और अगर सावधानी न रखी जाए तो बीमारी को गंभीर भी कर देता है। लोग समझे बगैर खुद डॉक्टर बन बैठते हैं।
- एसपी नौटियाल, नीलम मेडिकोज, हरिद्वार रोड
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