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शारदीय नवरात्र शुरू, जानिए इस पर्व के बारे में सबकुछ

Thu, 25 Sep 2014 12:28 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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आखिर लंबे इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं। गुरुवार से भव्य और श्रद्धा से भरपूर शारदीय नवरात्र शुरू हो गए। अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू हो रहे नवरात्र में इस बार नवमी और दशमी तिथि एक ही दिन पड़ रही हैं।
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दोनों तिथियों की शक्ति स्वरूपों की पूजा एक साथ होगी। ज्योतिषियों के मुताबिक घट स्थापना के लिए गुरुवार सुबह 7:50 बजे से 10:12 बजे तक का समय सर्वोत्तम है।

शारदीय नवरात्र के पहले दिन मां शक्ति के शैल पुत्री स्वरूप की उपासना की जाएगी। उत्तराखंड विद्वत सभा आचार्य भरत राम तिवारी ने बताया कि इस बार नवमी और दशमी तिथि (दशहरा) एक ही दिन है।
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तिवारी के मुताबिक नवरात्र में पूरे नौ दिन व्रत नहीं रख सकते हैं तो तीन, पांच या सात व्रत रख सकते हैं। डॉ. आचार्य सुशांत राज ने बताया कि देवी व्रतों में कन्या पूजन आवश्यक है। दो से दस वर्ष तक की कन्याओं के पैर धोकर गंध-पुष्प आदि से पूजन कर उन्हें भोजन-मिष्ठान आदि कराना चाहिए।
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घट स्थापना का शुभ समय

गुरुवार सुबह तुला लग्न में 7:50 बजे से 10:12 बजे तक घट स्थापना का शुभ मुहूर्त है। अगर कोई इस वक्त घट स्थापना नहीं कर सकता है तो वृश्चिक लग्न में सुबह 11:36 बजे से 12: 24 बजे से मध्याह्न तक का समय और भी शुभ रहेगा।

प्रतिपदा तिथि मध्याह्न 1:10 बजे तक रहेगी। इस दिन गुरुवार, बव करण, हस्त नक्षत्र शाम 7:25 बजे तक रहेगा। घट स्थापना अमावस्या युक्त प्रतिपदा में वर्जित है। गुरुवार को डेढ़ बजे से अपराह्न तीन बजे तक राहुकाल रहेगा। प्रतिपदा तिथि भी 1:10 मिनट तक रहेगी। इसलिए मध्याह्न 12:24 बजे तक घट स्थापना कर लेनी चाहिए।

मंदिरों में पूजन
पहले दिन देवी पूजन के लिए मंदिरों में तैयारियां पूरी हो गई। इस मौके पर कालिका माता मंदिर, टपकेश्वर स्थित माता वैष्णो देवी गुफा, श्याम सुंदर, राधा-कृष्ण आदि मंदिरों में सुबह माता का विशेष अभिषेक होगा। पूजा आरती आदि के साथ पूरे दिन भजन-कीर्तन का दौर चलेगा।

ये हैं देवी के नौ स्वरूप, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं

प्रथम नाम -शैलपुत्री
द्वितीय- ब्रह्मचारिणी
तृतीय- चंद्रघंटा
चतुर्थ- कूष्मांडा
पंचम-स्कंदमाता
षष्ठी- कात्यायनी
सप्तम- कालरात्रि
अष्टम- महागौरी
नवम- सिद्धि-दात्री

पृथ्वीनाथ मंदिर में भजन संध्या
श्री पृथ्वीनाथ मंदिर में सुबह घट स्थापना होगी। साथ ही मंदिर में सभी मूर्तियों के वस्त्र बदले जाएंगे। शाम को मेला मईया नाम से भजन संध्या होगी। इसमें नौ दिन अलग-अलग टोलियां आकर माता का गुणगान करेंगी। सेवादार संजय गर्ग ने बताया कि दो अक्तूबर को डांडिया रास, फूलों की होली, महाआरती आदि होगी।
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नवरात्र: दो ऋतुओं के मिलन का पर्व

हेमवती नंदन भट्ट
नवरात्र सामान्यतौर पर दो ऋतुओं का मिलन काल है। सर्दी और गर्मी की ऋतुएं जब मिलती हैं, तो यह शुभ अवसर आता है।

जिस तरह से क्षितिज में जब सुबह और शाम दोनों मिलते हैं, यानि सूर्य का उदय हो रहा हो या सूर्यास्त उस संधि को संध्या का समय कहते हैं। भारतीय धर्म परंपरा में दोनों संध्याओं के मिलन की तरह दोनों ऋतुएं मिलती हैं, तब भी साधना, उपासना का क्रम और विधान बनाया जाता है।

सामान्यतौर पर नवरात्र दो माने गए हैं। सर्दी जब आने को होती है और गर्मी के विदाई के समय आने वाले आश्विन नवरात्र कहे जाते हैं। सर्दी के विदा होने और गर्मी के आगमन के दिनों में आने वाले नवरात्र को चैत्र (वासंतिक) नवरात्र कहा जाता है। लिहाजा दो प्रधान ऋतुओं का मिलनकाल इस तरह अति महत्वपूर्ण है।

नवरात्र में भी नौ दिनों की यह विशिष्ठ अवधि और भी अधिक विशेष है। वैसे चार नवरात्र भी माने जाते हैं। छह-छह महीनों के अंतराल के स्थान पर तीन-तीन महीनों के अंतर से चार नवरात्र यानि आश्विन और चैत्र की दो प्रमुख नवरात्रों के अलावा आषाढ़ और पौष में भी ऋतु परिवर्तन की बेला पर दो नवरात्र हैं। जिन्हें गुप्त नवरात्र कहते हैं। मगर प्रमुख और प्रचलित नवरात्र दो ही हैं।

ज्योतिष के अनुसार नवरात्र के इन नौ दिनों में साधक अपने अपने तरीके से संयम, साधना और संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्र (रात एवं दिन) बड़े ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं और उन प्रत्येक क्षणों में साधक अपनी चेतना को शुद्ध करता हुआ आगे बढ़ने का प्रयास करता है।
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