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Shardiya Navratri 2023: अपने ज्ञान और इच्छा से परिवार के साथ ही दूसरे के लिए भी 'शक्ति' बनीं ये महिलाएं

Fri, 20 Oct 2023 12:44 PM IST
रेनू सकलानी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

नवरात्र के छठवें दिन पढ़िए ऐसी ही नौ महिलाओं की कहानी, जो समाज में अलग स्थान रखती हैं। कोई निशुल्क इलाज कर रहा है, तो कोई गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा रखी है। 
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डॉ. योगेश्वरी और कंचन जदली - फोटो : amar ujala

महिलाओं ने जब भी अपने ज्ञान और इच्छाशक्ति का उपयोग किया है, वह हमेशा परिवार के साथ-साथ दूसरों के लिए भी 'शक्ति' बनकर सामने आई हैं। नवरात्र के अवसर पर अमर उजाला अपने पाठकों को उन 'शक्तियों' से परिचित करा रहा है, जिन्होंने राज्य में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी ताकत से एक अलग मुकाम बनाया है।

कोई निशुल्क इलाज कर रहा है, तो कोई गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा रखी है। कोई संस्कृति से लोगों को रूबरू करा रहा है तो कोई पेड़ों को ही औलाद मान रहा है। आज छठवें दिन पढ़िए ऐसी ही नौ महिलाओं की कहानी, जो समाज में अलग स्थान रखती हैं।

देहरादून: दांत का निशुल्क इलाज कर जबड़े लगा रहीं डॉ. योगेश्वरी 

दून अस्पताल के दंत रोग विभाग में कार्यरत डॉ. योगेश्वरी कृष्णन नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन से जुड़ी हैं। इसके माध्यम से वह मरीजों के दांत का निशुल्क इलाज करती हैं। योगेश्वरी ने बताया कि उनकी मां मनोरोग चिकित्सक हैं। वह मां को इलाज करते देख डॉक्टर बनीं। वह दून अस्पताल से बचे समय में अपनी टीम के साथ पहाड़ी इलाकों, स्कूलों, आश्रमों में जाती हैं और शिविर लगाकर दांत का इलाज करती हैं। दांत के इलाज के लिए वह अब तक 69 कैंप लगा चुकी हैं। गत दिनों तीन दिन के कैंप में 80 मरीजों को जबड़े बनाकर लगाए हैं। इनमें आंशिक और पूरे मुंह के जबड़े शामिल हैं। उनकी टीम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भी दांत का निशुल्क इलाज कर चुकी है। उन्होंने कोविड में ब्लैक फंगस के मरीजों को एम्स ऋषिकेश में भी मुफ्त कृत्रिम अंग दिया था।

देहरादून: कार्टून से उत्तराखंड की संस्कृति से रूबरू करा रही लाटी

लाटी किरदार से लोगों के बीच चर्चाओं में आई कंचन जदली अपने कार्टून से लोगों को उत्तराखंड की संस्कृति से रूबरू करा रही हैं। मूल रूप से कोटद्वार निवासी कंचन पहाड़ी कार्टून, चित्रों और गुदगुदाती पंचलाइन से लोगों को अपनी बोली भाषा से जुड़े रहने के लिए प्रेरित कर रही हैं। कंचन ने अपने डिजिटल आर्ट के जरिए प्रवासियों को उत्तराखंड से जोड़ने का काम किया है। लाटी के कार्टून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने सोशल मीडिया पर साझा किया था। कंचन अपने कार्टून के जरिए उत्तराखंड में भू-कानून लागू करने की मांग उठाने के साथ यहां के तीज-त्योहारों के प्रति लोगों को जागरूक करती हैं। जबकि वह उत्तराखंड के खानपान, वेशभूषा, लोक पर्व समेत प्रदेश की संस्कृति से जुड़े कई कार्टून बना चुकी हैं।

 

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कलावती देवी और  सुचित्रा अग्रवाल - फोटो : amar ujala

पोखरी: पेड़ों को ही औलाद मानती हैं कलावती देवी 

विकासखंड पोखरी के कांडई चंद्रशिला गांव की कलावती देवी (78) ने कंटीली झाड़ियों वाले क्षेत्र को बांज के हरे जंगल में तब्दील कर दिया। जिसके लिए सरकार ने उन्हें 2012 में तीलू रौतेली पुरस्कार से नवाजा। 22 साल की उम्र में पति का निधन होने के बाद उन्होंने अपने दम पर जीवन को आगे बढ़ाया। 30 साल पहले उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में काम शुरू किया। गांव के नीचे झाड़ नामक तोक में कंटीली झाड़ियों को साफ कर वहां बांज के सैकड़ों पेड़ लगाए। उनकी देखभाल की। आज वहां घना जंगल है। कलावती का कहना है कि उनके बच्चे नहीं हैं, यह पेड़ ही उनकी औलाद हैं। 2011 में पोखरी के तत्कालीन एसडीएम व वर्तमान में चमोली के सीडीओ डॉ ललित नारायण मिश्र ने इस जंगल का निरीक्षण किया, उनकी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने उन्हें तीलू रौतेली पुरस्कार से नवाजा। 
 

देहरादून: गरीब बच्चों को पढ़ाने का उठाया जिम्मा

बसंत विहार निवासी सुचित्रा अग्रवाल ने परिवार की आमदनी से गरीब बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई की वोकेशनल ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं। समाज सेवी सुचित्रा अग्रवाल ने समग्र संस्था बनाकर 2008 से गरीब बच्चों को शिक्षा दे रही हैं। मलिन बस्तियों में रहने वाले परिवार के बच्चों को कक्षा एक से नौ तक की पढ़ाई का खर्च वह खुद उठा रही हैं। परिवार की आमदनी से कुछ हिस्सा बचा कर वह पढ़ाने में खर्च कर रही हैं। अभी वह 42 बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठा रही हैं। इसके अलावा बच्चों के कपड़े, भोजन समेत अन्य जरूरतों की भी पूरा करती हैं। उनकी इस मुहिम से कई बेटियां लैब टेक्नीशियन तक बन गईं और कई अभी तैयारी कर रही हैं।

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रुड़की: स्वावलंबी बनीं, जैविक खाद को बनाया सहारा

करौंदी निवासी महिला शीलो पशुओं के गोबर से जैविक खाद बनाकर और उनका दूध बेचकर स्वावलंबी बनी हैं। शीलो के पति की पांच साल पहले मौत हो गई थी। ऐसे में पांच बच्चों का भार उन पर आ गया, लेकिन हिम्मत हारने के बजाय घर के साधनों से ही उन्होंने परिवार संभालने की ठानी। शुरू में एक पशु पालकर उसके दूध को बेचकर और गोबर से जैविक खाद बनाकर बेचना शुरू किया। वर्तमान में दूध बेचकर और गोबर से जैविक खाद बनाकर वह परिवार पाल रही है। शीलो के बच्चे पढ़ाई-लिखाई के बाद बचे समय में जैविक खाद बनाने के काम में लगे रहते हैं। इस जैविक खाद से शीलो एक महीने हजारों रुपये आसानी से कमा लेती हैं। धीरे-धीरे इस जैविक खाद की दूसरे गांव में भी डिमांड बढ़ने लगी है। 

देहरादून: शिक्षा की अलख जगा रही मंजू

आवास विकास ऋषिकेश निवासी डॉ. मंजू बडोला 2020 में हरिचंद गुप्ता आदर्श कन्या इंटर कॉलेज से सेवानिवृत होने के बाद भी निरंतर शैक्षणिक क्रिया-कलापों से जुड़ी हैं। वह क्षेत्र के विभिन्न विद्यालयों में शैक्षणिक अनुभव का लाभ दे रही हैं। दून घाटी शिक्षण संस्थान, शिवा होली एकेडमी, सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में इनकी उपस्थिति लगातार बनी रहती है। इनकी ओर से कई विद्यालयों में शिक्षण सामग्री और गणवेश वितरित किए जाते रहे हैं। शिक्षण संस्थान और शिक्षा के प्रति इनकी रुचि इन्हें ऊर्जावान और जीवंत बनाए हुए हैं। हाल ही में इन्हें दिल्ली में देवभूमि लोक उत्तराखंड अवार्ड 2023 से नवाजा गया है। इसके अलावा इन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। 

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बीना देवी और गीता गैरोला - फोटो : amar ujala

कर्णप्रयाग: बीना ने खतरनाक सड़कों पर जोखिम को दी मात

अगर ठान लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल हालात को इंसान पार कर देता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है देवाल ब्लॉक के वाण गांव की बीना देवी ने। बीना टैक्सी चालक हैं और प्रदेश की दुर्गम और सर्पीली सड़कों पर कार चलाती हैं। बीना आज पूरे क्षेत्र के लिए महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं। बीना ने बताया कि वह हरनी गांव की रहने वाली हैं। हाईस्कूल पास करने के बाद 2010 में उनकी शादी सुरेंद्र सिंह से हुई। सुरेंद्र टूरिस्ट गाइड हैं। पति की कमाई से घर चलाना संभव नहीं हो पा रहा था जिसे देखते हुए बीना ने भी जिम्मेदारी उठाने की ठानी और 2016 में कार चलाना सीखा। इसके बाद उन्होंने लोन लेकर कार खरीदी और फिर इसे टैक्सी के रूप में चलाना शुरू किया। उनका मानना है कि हर महिला को गाड़ी चलानी सीखनी चाहिए, ताकि मुश्किल वक्त में काम आ सके। 

उत्तरकाशी: गीतों और कविताओं से कर रही लोगों को जागरूक

नगर पालिका बाड़ाहाट के वार्ड 9 लदाड़ी निवासी गीता गैरोला अपने गीतों और कविताओं से लोगों को पर्यावरण संरक्षण और गंगा स्वच्छता जैसे विषयों पर जागरूक कर रही हैं। सामाजिक कार्यों में सक्रियता के लिए इसी साल उन्हें महिला दिवस पर दिल्ली में सम्मानित किया गया। 52 वर्षीय गीता उत्तराखंड राज्य आंदोलन 1994 से ही करीब 30 वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। वह पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज उत्पीड़न, पलायन व पानी बचाओ आदि मुद्दों को लेकर जनता के बीच जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। पिछले कुछ समय से वह गढ़वाली बोली और हिंदी में भी कविताएं व गीतों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, पलायन व गंगा स्वच्छता जैसे मुद्दों पर लोगों को जागरूक करने का काम कर रही हैं। 

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सुषमा जखमोला - फोटो : amar ujala

कोटद्वार: 350 गोवंशों की सेवा कर रही हैं सुषमा

कोटद्वार के मानपुर की निवासी सुषमा जखमोला को निराश्रित घायल पशुओं की सेवा से सुकून मिलता है। क्षेत्र में कहीं भी पशुओं के घायल पड़े होने की सूचना पर वह मौके पर पहुंचती हैं और उसे अपनी गोशाला में ले जाकर उपचार करती हैं। इसके लिए सुषमा ने आकृति प्राणी सेवा संस्था का गठन किया है। जिसके माध्यम से वह तल्ला मोटाढांक के पास एक गोशाला का संचालन कर रही हैं। वह पशु क्रूरता के खिलाफ भी लोगों को जागरूक कर रही हैं। वह पिछले 35 साल से इस कार्य से जुड़ी हैं। वर्तमान में सुषमा पशु क्रूरता निवारण समिति पौड़ी की सदस्य भी हैं। वह पशुबलि प्रथा रोकने के लिए मेनका गांधी की संस्था के साथ भी काम कर रही हैं। उनकी गोशाला में वर्तमान में 350 घायल निराश्रित गोवंश का उपचार चल रहा है। 

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