शनिदेव को सबसे क्रूर देव माना जाता है। जिस कारण लोग इनसे भयभीत रहते हैं। लेकिन अगर आप शनिदेव के बारे में ये बातें जान लेंगे तो आप उनके अगाध भक्त बन जाएंगे।
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शनि
श्री शनिदेव पूजन अर्चन पर आयोजित धर्म परिचर्चा में शनिदेव की महानता के बारे में बताया गया। श्री गुरु तेग बहादुर मार्ग स्थित धर्म परिचर्चा केंद्र में ज्योतिषाचार्य अजेय शर्मा ने कहा कि श्री शनिदेव का पूजन लाभ व स्वार्थ को लेकर नहीं करना चाहिये। वे न्यायाधीश हैं और सब कुछ कर्म अनुसार देते हैं।
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शनि मंगल
हमें शुभ कर्म करते रहने चाहिए। दुष्कर्मों का फल देर सवेर अवश्य मिलता है। इसलिए लालचवश गलत राह पर नहीं चलना चाहिए। ज्योतिष अजेय शर्मा ने कहा कि शनिदेव भगवान सूर्य व माता छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं। शनि क्रूर ग्रह नहीं हैं। कुछ लोगों ने इन्हें बदनाम कर रखा है।
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शनि
पंडित अजेय शर्मा ने महाराज दशरथ की कथा सुनाई। शनि के आदिदेवता प्रजापिता ब्रह्म और प्रत्यधिदेवता यम हैं। यह एक एक राशि में 30-30 महीने रहते हैं। यह मकर व कुंभ राशि के स्वामी है। इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। इनकी शांति के लिए मृत्युंजय जप, नीलम धारण, काली गाय, भैंस, कस्तूरी व सुवर्ण का दान देना चाहिए। शनिवार को नगर भर में परिक्रमा कर गऊ व गोवंश को भोजन कराया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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शनि
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य बताते हैं कि शनि संस्कृत का शब्द है। शनये कमति स:। इसका अर्थ है, अत्यंत धीमा। शनि की गति की बहुत धीमी है। शनि की गति भले ही धीमी हो पर शनि देव को बहुत की सौम्य देव मान जाता है।
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शनि
शनि देव सूर्य देव पुत्र होने के कारण बहुत ही शक्तिशाली हैं। जिस कारण मानवों और देवताओं में शनि देव का डर व्याप्त है। शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है। शनि देव पाप और अन्याय करने वालों को अपनी दशा या अंतर दशा में दंडित करते हैं। ताकि प्रकृति का संतुलन बन रहे।
शनि देव के बारे में कुछ भ्रांतियां है। जिस कारण शनि देव को शुभ नहीं माना जाता है जोकि सरासर गलत है। शनि देव को कलयुग का देवता माना जाता है। जब भी शनि देव की दशा या अंतर दशा जातक पर आती है तो वह कर्म के अनुसार फल भोगता है। शनि देव अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते हैं।