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जब सैनिकों की लाशों से भर दिया गया कुआं

Sun, 24 Aug 2014 11:31 PM IST
जोगेंद्र सिंह मावी/अमर उजाला, हरिद्वार
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देश की आजादी का संग्राम 1857 से पहले ही शुरू हो चुका था। पूरे देश में आजादी के लिए चिंगारी जल उठी थी। 1857 के संग्राम में कूदने को लाहौर की मियामीर छावनी में बंगाल रेजिमेंट 26 इंफेन्टरी में प्रकाश पांडे ने एक अंग्रेज की तलवार छीनकर उसी अंग्रेज का सिर काट दिया था।
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इस दौरान दो हिन्दुस्तानी सैनिकों ने प्रकाश पांडे का विरोध किया तो पांडे ने उनके भी सिर कलम कर दिए गए थे। यही से विद्रोह शुरू हुआ और रेजिमेंट से 500 जवान आजादी की लड़ाई लड़ने निकल पड़े थे।

31 जून को लाहौर की मियामीर छावनी से निकलकर बंगाल रेजीमेंट 26 इंफेन्टरी के 500 सैनिकों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी। वह वहां से भागकर रावी दरिया के किनारे पहुंचे। इन सैनिकों को यहां पर अंग्रेजी फौज ने घेर लिया और अंग्रेज अधिकारी कूपर ने निहत्थे हिन्दुस्तानी सैनिकों पर सीधे फायरिंग करवा दी। गोलीबारी में 218 सैनिक वहीं पर शहीद हो गए और शेष 282 को बंदी बना लिया।
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ज‌िंदा सैन‌िकों को भी कर द‌िया था दफन

इन 282 सैनिकों को अजनाला तहसील अमृतसर पंजाब में बंधक बनाकर रखा और इनमें से 237 बंदी सैनिकों को गोली मार दी। इनकी लाशों को वहां पर बने चींदो वाला कुंआ में डाल दिया।

शेष 45 बंदी सैनिकों को एक छोटे सी कोठरी में कैद कर बंद कर दिया। इनमें से कुछ दम घुटने से मर गए और जो जीवित बचे उन्हें भी उसी कुंए में डाल दिया गया और कुंए को मिट्टी से भर दिया गया। इस कुएं को 'कालियां दा खूहं' अर्थात 'काले लोगों का कुआं' कहा जाता है।

देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद इसी कुंए में दफन गुमनामी में कैद हो गए। लेकिन इतिहास के पन्ने पर खून से लिखी गई स्वतंत्रता की इबारत को वहां के स्थानीय निवासियों की बदौलत खोज निकाला।

गुरूद्वारा शहीद वाला कुंआ कमेटी ने 28 फरवरी 2014 को खुदाई की और मात्र तीन दिन में सभी शहीदों की अस्थि खोज निकाली।

सौ साल बाद मनाई थी इसी कुएं पर बरसी

जिस स्थान पर यह शहीदी कुआं था, यहां पर 1957 में घटना के सौ साल बाद कामरेड दलीप सिंह टपशाला ने बरसी मनाई थी। इस घटना के बाद यह स्थान दोबारा से चर्चा में आया। इसके बाद कुएं के ऊपर सन 1972 में गुरुद्वारा बना दिया गया था।

जब 2012 में शहीदी कुएं की खोज की गई तो गुरूद्वारे के चलते कुछ लोग इसकी खुदाई के विरोध में आ गए।

इसके बाद वहीं पर नजदीक में आलीशान इमारत तैयार कर गुरु ग्रंथ साहब को उसमें शिफ्ट किया गया तब जाकर वहां खुदाई शुरू की गई तो प्रयास सफल हुआ और शहीदों की हड्डिया निकाली गई।

2007 से चल रहा था प्रयास
शहीदों की अस्थि निकालने को पहली बार बैठक 2007 में अमरजीत सिंह सरकारिया के प्रयास से हुई। इसके बाद 2008 में 11 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया। कमेटी के प्रयास से इतिहास के पन्नों से पूरा ब्यौरा निकाला गया और कुएं को खोजा गया।

यह सामान मिले थे खुदाई में
शहीदों की अस्थियों के अलावा उनके सात हजार दांत, तीन मेडल, दो विक्टोरिया क्रास, 82 सिक्के एक रुपये के, तीन कारतूस, तीन सोने के लॉकेट, 20 मोती, ताम्बे के पैसे, दो कड़े, तीन रिंग, एक टूथटिक, एक बैलट लॉकेट, सोने का तार, एक रुद्राक्ष, तीन मोती रुद्राक्ष जैसे मिले हैं।
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अभी शेष है दो बॉक्स अस्थियां

पंजाब सरकार के पास अभी भी दो बॉक्स अस्थियां शेष है। जिनमें अधिकांश खोपड़ियां है जिनके डीएनए जांच के लिए कार्य किया जा रहा है। खुदाई में जो सात हजार दांत मिले थे वह भी सरकार के पास ही है। इनकी भी जांच होगी, ताकि गुमनाम शहीदों को उनकी पहचान मिल सके।

शहीदों को नाम देने के लिए ब्रिटेन से संपर्क
कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि इन शहीदों के नाम पते ईस्ट इंडिया कंपनी के पास हैं। इंग्लैंड के अधिकारियों से संपर्क किया जा रहा है। इसके लिए कमेटी बनाई गई है। उम्मीद है कि शीघ्र इन 500 गुमनाम शहीदों को पहचान मिल सकेगी।

तिथि विशेष का महत्व
28 फरवरी 2014 को इन शहीदों की अस्थि निकालने का काम शुरू किया गया। यह तिथि इसलिए चुनी गई, फरवरी का दूसरा महीना और 28 तारीख। यानि 282 शहीदों की अस्थि निकालने का दिवस विशेष इतिहास में दर्ज रहे।

शहीद स्मारक बनाने की तैयारी
पंजाब सरकार ने कुंए के स्थान पर शहीद स्मारक बनाने को एक एकड जमीन दी है। इस जमीन पर कमेटी शहीदी स्मारक बनाने का काम शीघ्र ही शुरू कर देगी। यहां पर स्मारक में शहीदों से जुड़ी यादों को और सामान को संभालने को रखेंगी।
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