भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के वैज्ञानिकों की टीम एशिया, अफ्रीका और यूरोप समेत कई देशों में पाए जाने वाले दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों की सेटेलाइट से निगरानी कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक जीपीएस रेडियो कॉलर लगाकर पक्षियों की प्रवासी स्थल और प्रजनन की गतिविधियों का अध्ययन किया जा रहा है। साथ ही अफ्रीका या यूरोप के देशों से आने वाले पक्षियों का रूट भी रिकार्ड किया जा रहा है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ पक्षी विज्ञानी डॉ. सुरेश कुमार के मुताबिक फिलहाल योजना का पहला चरण साइबेरिया में पाए जाने वाले आमूर फॉल्कन व कॉमन क्रेन की गतिविधियों पर केंद्रित है। कॉमन क्रेन साइबेरिया में पाए जाते हैं, लेकिन ठंड से बचने या फिर ब्रीडिंग के लिए गर्म जलवायु की तलाश में ये भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देशों में आते हैं।
साइबेरिया में पाए जाने वाले आमूर फॉल्कन भी ब्रीडिंग के लिए भारत से होते हुए एशिया के कई देशों की ओर रुख करते हैं। जो नगालैंड में कुछ समय के लिए प्रवास करते हैं। नगालैंड में कुछ समय प्रवास करने के बाद आमूर फॉल्कन अफ़्रीका चले जाते हैं जहां वह काफी लंबा वक्त गुजारते हैं।
पाइड कुक्कू की भी सेटेलाइट से निगरानी
कॉमन क्रेन व आमूर फॉल्कन के अलावा पाइड कुक्कू की भी सेटेलाइट के जरिए निगरानी की जा रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अफ्रीका महाद्वीप के कई देशों में पाए जाने वाला पाइड कुक्कू मानसून शुरू होने के साथ ही प्रवास के लिए भारत आते हैं।
यह पक्षी दक्षिण भारत की ओर रुख करते हैं और ब्रीडिंग के बाद अपने मूल ठिकाने की ओर को निकल जाते हैं। पक्षियों में जीपीएस रेडियो कॉलर लगाने के बाद कई अहम जानकारियां मिल रही हैं। इन पक्षियों के उन प्रवास स्थलों को चिह्नित किया जा रहा है। जहां ये ब्रीडिंग के लिए प्रवास करते हैं। साथ ही उन मार्गों को भी चिह्नित किया जा रहा जा रहा है जिनसे होते हुए ये अपने मूल निवास स्थान से भारत समेत अन्य देशों में पहुंचते हैं।
संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम अफ्रीका, यूरोप के कई देशों में पाए जाने वाले अमूर फॉल्कन, कॉमन क्रेन व पाइप कुक्कू जैसे पक्षियों को जीपीएस रेडियो कॉलर लगाकर सेटेलाइट से उनकी निगरानी कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की टीमों ने इन पक्षियों के बारे में कई अहम जानकारियां जुटाई हैं। इसमें इनके प्रवास स्थलों व उड़ान के मार्गों का चिह्नीकरण किया जाना शामिल है। भविष्य में कहीं और प्रवासी पक्षियों को जीपीएस रेडियो कॉलर लगाकर उनकी निगरानी का प्रयास होगा।
-डॉ. धनंजय मोहन, निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान