सियासी मैनेजमेंट के माहिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत का असली इम्तिहान अब होगा।
16 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अपनी सरकार बचाए रखना बड़ी चुनौती होगी। एक ओर भाजपा नेताओं के सत्ता परिवर्तन के बयान प्रदेश सरकार पर काले बादल की तरह मंडरा रहे हैं।
दूसरी ओर खराब नतीजे पार्टी में उनकी अंदरूनी मुश्किलें बढ़ाएंगे। बदले राजनीतिक परिदृश्य में बहुमत के लिए सहयोगियों को छिटकने से बचाने की परेशानी से दो-चार होना होगा।
राजनीतिक हमले के लिए रावत को रहना होगा तैयार
अगर एक्जिट पोल के नतीजे हकीकत में बदलते हैं तो लगता है कि उत्तराखंड का स्कोर 4-1 होगा।
अगर कांग्रेस के खाते में एक मात्र सीट हरिद्वार रही तो भी उन्हें श्रेय से अधिक राजनीतिक हमले के लिए तैयार रहना होगा।
पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी हरिद्वार में उनकी पत्नी रेणुका रावत की जीत को ही मुद्दा बनाएंगे। अगर कांग्रेस के खाते में टिहरी या पौड़ी सीट जाती है तो भी निशाने पर रावत ही रहेंगे।
घर के भेदी की भूमिका में रहेंगे सतपाल
उनके विरोधी हर हाल हार की ठीकरा उन पर फोड़कर आक्रामक होंगे। नतीजे 3-2 पर छूटते हैं तो ही मुख्यमंत्री घर में सुरक्षित माने जाएंगे।
मुख्यमंत्री भले ही अपने घर की लड़ाई पर काबू पा लें, लेकिन पार्टी छोड़कर गए सतपाल महाराज बदली परिस्थिति में घर के भेदी की भूमिका भली प्रकार निभाएंगे।
केंद्र में भाजपा के सत्ता में आते ही महाराज का कद बढ़ना तय है। अब प्रदेश की राजनीति में महाराज लोगों को कुछ दे पाने और कुछ करने की हैसियत में होंगे।
प्रदेश में विधायकों की गिनती शुरू
बदले परिदृश्य में तमाम विधायक अपने भविष्य का ठौर भी तलाशेंगे। ऐसे में सरकार में शामिल उनके कैंप से जुड़े विधायकों को संभाले रखना मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
बदले हालात में मंत्री प्रसाद नैथानी, प्रीतम सिंह पंवार, दिनेश धनै और हरीश चंद्र दुर्गापाल का रुख सबसे अहम होगा।
सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव की तरह ही प्रदेश में विधायकों की गिनती शुरू हो गई है।
कांग्रेस-बीजेपी के बीच फासला कम
मुख्यमंत्री बनने से पूर्व रावत कांग्रेस आलाकमान को आश्वस्त करके आए थे कि कांग्रेस विधायकों की संख्या कम नहीं होगी। उनके लिए भाजपा का ही कोई विधायक सीट खाली करेगा।
कांग्रेस के 33 और भाजपा के 30 विधायकों के बीच का फासला कम है। बसपा, यूकेडी और निर्दलीयों को मिलाकर सात विधायक सरकार खींच रहे हैं।
बसपा के दो निलंबित विधायक फिलहाल रावत के साथ खड़े हैं। बसपा में हुई टूटफूट के बाद मायावती ने हरीश सरकार से समर्थन वापसी की घुड़की भी दी है।