सात सालों से नारी निकेतन के दमघोंटू माहौल में परिजनों को याद कर रोते-रोते नेपाल की जिस संवासिनी की आंखों के आंसू सूख गए थे उसे जरा सी कोशिश में अपने वतन लौटने की राह मिल गई है।
नारी निकेतन प्रबंधन अगर पहले यह कोशिश कर लेता तो संवासिनी को सात साल तकलीफ में न गुजारने पड़ते, शायद और भी कई संवासिनियों को घर मिल जाता। अपर सचिव मनोज चंद्रन ने जरा सी कोशिश की और 24 घंटे के अंदर संवासिनी का पूरा घर-द्वार मिल गया।
नेपाल की यह संवासिनी वर्ष 2009 में बहुत बुरी स्थिति में नारी निकेतन आई थी। उसे हरिद्वार से यहां भेजा गया था। ऐसा नहीं था कि वह अपना कुछ अता-पता बता नहीं पा रही थी, उसे अपने जिले अरगाखाती का नाम याद रहा है, लेकिन नारी निकेतन प्रबंधन के किसी जिम्मेदार ने ध्यान ही नहीं दिया।
संवासिनी की जिंदगी के सात साल मानसिक रूप से बीमार संवासिनियों के बीच रोते हुए कट गए। एक दिन कोशिश हुई और उसे अपना घर मिल गया।