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उद्योगपति थापर-नंदा अरेस्टिंग केस, एडीजे कोर्ट से भी नहीं मिली बेल

Sat, 07 Jan 2017 12:03 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, कोटद्वार (पौड़ी)
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जमानत के ल‌िए कोर्ट पहुंचे वकील - फोटो : AmarUjala
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लैंसडौन वन प्रभाग के रिजर्व फॉरेस्ट में वन कानूनों के उल्लंघन के आरोपी उद्योगपति समीर थापर-जयंत नंदा और उनके साथियों को शुक्रवार को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की अदालत से भी राहत नहीं मिल पाई है। एडीजे धनंजय चतुर्वेदी की अदालत ने बचाव पक्ष की ओर से दाखिल की गई जमानत याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने मामले को बेहद गंभीर मामला बताते हुए, बचाव पक्ष की दलीलों को जमानत का पर्याप्त आधार नहीं माना।
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बचाव पक्ष की ओर से शुक्रवार को एडीजे कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता समेत दस अधिवक्ताओं ने भारतीय वन अधिनियम 1927 की विभिन्न धाराओं में समीर थापर और जयंत नंदा समेत 15 लोगों की जमानत के लिए प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया गया।

बचाव पक्ष की ओर से आरोपियों को झूठा फंसाने की दलीलें दी गई। कहा गया कि आरोपी उद्योगपति हैं, इसलिए उन्हें साजिशन फंसाया जा रहा है। समीर थापा और उनके दोस्त नए साल के उपलक्ष्य में अनुमति लेने के बाद ही कोल्हूचौड़ गेस्ट हाउस में ठहरे थे। उनके जो वाहन पुलिस द्वारा सीज किए गए हैं, उनकी अनुमति भी उनके पास है।
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दो जनवरी से पौड़ी जेल में बंद हैं आरोपी

नया साल मनाने आए थे सभी। - फोटो : amar ujala
बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के सभी आरोपों को गलत बताते हुए उनकी जमानत याचिका स्वीकार करने की प्रार्थना की। मालूम हो कि सभी आरोपियों को एक जनवरी 2017 को जश्न मनाने के दौरान वन कानूनों के उल्लंघन, आबकारी और एक्साइज एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। आबकारी और एक्साइज एक्ट में तो अभियुक्तों को जमानत मिल गई, मगर वन कानूनों के तहत सभी दो जनवरी से पौड़ी जेल में हैं।

उधर, अभियोजन पक्ष की ओर से बहस करते हुए जिला शासकीय अधिवक्ता अवनीश नेगी और नसीम बेग ने आरोपियों की जमानत याचिका का विरोध किया।

कहा कि रिजर्व फॉरेस्ट में बिना अनुमति के बड़ी संख्या में एकत्र होना, हथियार, कारतूस और शराब के जखीरे का मिलना साधारण बात नहीं है। आरोपी प्रभावशाली हैं, यदि उन्हें जमानत पर छोड़ गया, तो वो गवाहों को डरा-धमका सकते हैं। इससे विवेचना प्रभावित होने की संभावना है। साथ ही आरोपी बाहरी राज्यों के हैं, जिससे जमानत पर छूटने के बाद वे फरार भी हो सकते हैं।
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कोर्ट ने गंभीर मामला बताते हुए खारिज की याचिका

सभी आरोपी पौड़ी जेल में बंद हैं। - फोटो : AmarUjala
कोर्ट ने कहा कि भारतीय वन अधिनियम 1927 में उत्तराखंड राज्य की ओर से अधिनियम संख्या 1/2001 के द्वारा एक नई धारा 65-ए जोड़ी गई है, जिसमें यह प्रावधान है कि ऐसे अपराध के अंतर्गत अभिरक्षा में लिए गए व्यक्ति को जमानत पर नहीं छोड़ा जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि आरोपियों पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं। तथा जमानत के पर्याप्त आधार नहीं हैं। जमानत खारिज होने से मायूस आरोपियों के परिजनों और बचाव पक्ष ने कहा कि अब वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

अधिवक्ता अरविंद वर्मा, विजय नैथानी, शशिकांत बलूनी, प्रवेश रावत, संदीप कोठारी, मोइनुद्दीन, निप्रीत कौर, अंकिता आहूजा, रोहितोज सिंह और प्रिया शर्मा बचाव पक्ष की ओर से कोर्ट में प्रस्तुत हुए। 
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