उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के तीन दर्जन से अधिक गांवों के लोग रोजमर्रा की जरूरत के लिए 10 से 40 किमी दुर्गम पगडंडियां लांघने को मजबूर हैं।
इसका असर न सिर्फ क्षेत्र के विकास पर पड़ रहा है बल्कि भारी भरकम ढुलान भाडे़ से ग्रामीणों को नमक, चीनी जैसी जरूरत के सामान के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं।
जनपद के तीन दर्जन से अधिक गांव सड़क सुविधा से महरूम हैं। 10 से 40 किमी दुर्गम पैदल दूरी पर स्थित इन गांवों तक सामान का ढुलान खच्चरों पर निर्भर है। 100 किलो वजन का ढुलान 300 से 600 रुपये है। ढुलान भाड़े का सीधा असर सामान की कीमतों पर पड़ता है।
तभी तो इन गांवों में सभी वस्तुएं बाजार भाव से 5 से 30 रुपये अधिक दर पर उपलब्ध हो पाती हैं। ढुलान की दिक्कतों को देखते हुए ग्रामीण इस पर कुछ कह भी नहीं पाते और सरकार से सड़क की मांग कर थक चुके ग्रामीण अब इसे नियति मान बैठे हैं।
पैदल दूरी नाते हैं इन गांवों के ग्रामीण
मोरी प्रखंड में ओसला, ढाटमीर, पवाणी एवं गंगाड़ गांव सड़क से 15 से 17 किमी पैदल दूरी पर हैं। लिवाड़ी, फिताड़ी, रेक्चा, हरिपुर एवं कांसला पहुंचने के लिए भी 18-20 किमी पैदल दूरी तय करनी पड़ती है।
दोणी भीतरी क्षेत्र में कहने को मसरी तक सड़क है, लेकिन यह अक्सर बंद रहने से इस क्षेत्र के लोग 12 से 15 किमी पैदल दूरी नापने को मजबूर हैं।
पुरोला प्रखंड के सर बडियार क्षेत्र के सर, पौंटी, लेवटाड़ी, गौल, छानिका एवं कंसलौं तथा कामरा एवं सांखाल गांव सड़क से 35 से 40 किमी दूर हैं। भटवाड़ी प्रखंड के पिलंग, जौड़ाव, सिल्ला, स्याबा तथा आपदा के दौरान असी गंगा घाटी गांवों तक पहुंचने के लिए 10 से 18 किमी पैदल चलना पड़ता है।
हम सरकार से सड़कों की मांग करते थक चुके हैं। सड़क न होने से सबसे ज्यादा असर जरूरी वस्तुओं के दामों पर पड़ता है। ढुलान भाड़े से कीमतों में उछाल आना स्वाभाविक है। सरकार या तो सड़कों का निर्माण कराए या फिर सुदूरवर्ती गांवों में सस्ती दरों पर जरूरत के सामान की व्यवस्था कराए।
-हरबन सिंह चौहान, पूर्व सैन्य अधिकारी मोरी।