दिल्ली के कालिका मंदिर प्रांगण में देशभर से आए संतों के सम्मेलन में साईं बाबा को देवता मानने संबंधी प्रस्ताव को मतभेद के चलते एजेंडे से ही हटाना पड़ा।
इस मामले में परिषद महामंत्री हरि गिरि के विरोध के कारण कालिका पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत के साथ अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ज्ञानदास की कोशिशें निरर्थक साबित हुईं।
दिल्ली के कालिका मंदिर प्रांगण में मंगलवार को देशभर के संतों का सम्मेलन हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य मूल रूप से हिंदू धर्म स्थलों के अधिग्रहण के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करना था।
पर साईं बाबा विरोधी अभियान के खिलाफ खड़े अखाड़ा परिषद अध्यक्ष श्रीमहंत ज्ञानदास और महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत बैरागी अखाड़ों के साथ मिलकर साईं बाबा को देवता घोषित करने का प्रस्ताव भी रखने वाले थे।
एजेंडे से हटा दिया गया प्रस्ताव
परिषद के उच्चस्थ सूत्रों के अनुसार इसका पता छत्तीसगढ़ में बैठे शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को लग गया। उन्होंने परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरि से संपर्क साधा जो बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुंच गए थे।
हरि गिरि उस संघर्ष समिति के भी महामंत्री हैं जो साईं बाबा के मंदिर हटाने के लिए स्वरूपानंद द्वारा धर्म संसद में बनाई गई है।
संयोग यह रहा कि सात संन्यासी अखाड़ों में से केवल हरि गिरि के नेतृत्व में जूना अखाड़े के संत ही बैठक में पहुंचे। उनके विरोध एवं बहिष्कार की धमकी के कारण साईं बाबा को देवता घोषित करने का प्रस्ताव एजेंडे से हटा दिया गया।
कौन-कौन पहुंचे
इस सम्मेलन में देश के कई प्रमुख संतों के अलावा चर्चित नेता डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी भाग लिया।
संतों में शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम, जगद्गुरु रामानंदाचार्य हंसदेवाचार्य, महामंडलेश्वर अनुभूतानंद, महामंडलेश्वर धर्मदेव, श्रीमहंत नारायण गिरि, साधनानंद, राजेंद्र दास, विनोद गिरि, परशुराम गिरि, प्रेम गिरि, महामंडलेश्वर कपिल मुनि आदि प्रमुख हैं।
रायपुर की धर्म संसद में संतों ने सर्वसम्मत निर्णय लिए थे। साईं बाबा को अवतार न मानते हुए सहमति व्यक्त की गई थी कि वे मुसलमान हैं। ऐसे में उनको हिंदू देवता का दर्जा नहीं दिया जा सकता। ऐसे किसी प्रयास का सातों संन्यासी अखाड़े विरोध करेंगे।
- श्रीमहंत हरि गिरि, महामंत्री अखाड़ा परिषद