अनेक कुप्रथाओं पर संत जगत द्वारा रोक लगाने के बाद अब पूरे देश में बलि प्रथा बंद कराने की तैयारी हरिद्वार के अखाड़ा परिषद ने शुरू की है। संतों के विभिन्न वर्गों से वार्ता के दौर जारी है। उम्मीद है कि नासिक कुंभ तक इस
दिशा में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव तैयार हो जाएगा। कुंभ के मंच से प्रस्ताव पारित हो गया तो पूरे देश में संत जगत बलि प्रथा को रोक देगा।
जल समाधि प्रथा बंद
याद रहे कि अखाड़ा परिषद के प्रयासों से कईं कुप्रथाएं बंद हो चुकी है। यहां तक कि नागा संन्यासियों ने शताब्दियों से चली आ रही जल समाधि प्रथा को भी हरिद्वार कुंभ के बाद बंद कर दिया था।
अब अधिकतर जगह संन्यासी अपने मृत संतों को भू-समाधि प्रदान कर रहे हैं अथवा बैरागी अखाड़ों की भांति अग्नि संस्कार किया जा रहा है।
अखाड़ा परिषद ने अखिल भारतीय स्तर पर बलि प्रथा बंद करने के लिए वार्ता के दौर शुरू किए हैं। भारत साधु समाज, अखिल भारतीय संत समिति, षड़दर्शन साधु समाज, आश्रम परिषद सहित जगद्गुररुओं से भी वार्ता के दौर जारी है।
अखाड़ा सूत्रों के अनुसार अधिकतर संत चाहते हैं कि युगधर्म को देखते हुए प्रथाओं में परिवर्तन किया जाना चाहिए। आज के जमाने में पशु बलि का महत्व नहीं रहा है।
प्रतीकात्मक रूप से कद्दू, तरबूज आदि फलों की बलि दी जा सकती है। कई अखाड़ों ने सुझाव दिया है कि दाल की पिट्ठी से बने गोले की बलि भी प्रतीकात्मक रूप से देकर परंपरा का निर्वहन किया जा सकता है।
इस संदर्भ में सर्वसम्मति हो जाने के बाद अखाड़ा परिषद एक प्रस्ताव तैयार करेगी, जिसे सहमति के लिए साधु-संतों की संस्थाओं के पास भेजा जाएगा। हस्ताक्षर हो जाने के बाद प्रस्ताव को नासिक कुंभ में होने वाली अखाड़ा परिषद की राष्ट्रीय बैठक में पारित कराया जाएगा। यदि ऐसा हो पाया तो निश्चय अखाड़ों का प्रयास मील का नया पत्थर साबित होगा।
अतीत में बदलती रही परंपराएं
आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने कईं नई मान्यताएं स्थापित की थी। कईं पुरानी मान्यताओं में परिवर्तन किया। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि स्वनामधन्य संतों ने सती प्रथा और दहेज प्रथा आदि पर प्रतिबंध लगाया था।
सिखों के तीसरे गुरु अमरदास महाराज ने स्वयं इसी हरिद्वार में आकर सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और सफल हुए। यह ठीक है कि कुछ क्षेत्रों में बलि प्रथा को मान्य किया है लेकिन बदलता विश्व इसे पसंद नहीं करता।
अखाड़ा परिषद् प्रयत्न कर रही है कि कोई सर्वसम्मत प्रस्ताव तैयार हो जाए ताकि सुधारवादी निर्णय लिया जा सके। नासिक कुंभ में ऐसा संभव हो पाने के पूरे आसार हैं।
-श्रीमहंत हरि गिरि, राष्ट्रीय महामंत्री अखाड़ा परिषद