उत्तराखंड के साढ़े सात हजार से अधिक ग्राम प्रधानों के लिए खतरे की घंटी बजी है। राज्य सूचना आयोग ने सूचना के अधिकार अधिनियम का पालन न करने पर एक ग्राम प्रधान पर दस हजार रुपए का जुर्माना किया है।
'ग्राम प्रधान ही लोक सूचना अधिकारी'
यह पहला मामला है जब ग्राम प्रधान पर सूचना के अधिकार के तहत सीधे जुर्माना हुआ है। जनप्रतिनिधि होने के नाते ग्राम प्रधानों को वैसे लोक सूचना अधिकारी नहीं होना वाहिए और यह बात खुद कई बार शासन को बता चुका है। देश में अकेला उत्तराखंड राज्य ही है जहां ग्राम प्रधान भी लोक सूचना अधिकारी हैं।
रायपुर निवासी सुभाष शाह ने ग्राम पंचायत रायपुर से 15 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। यह सूचना नहीं मिली तो मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा। राज्य सूवना आयुक्त अनिल कुमार शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।
लोक सूचना अधिकारी ग्राम प्रधान का कहना था कि सूचना का आवेदन मिला ही नहीं। जबकि कोर्ट में सामने आया कि ग्राम प्रधान को अपीलार्थी ने खुद ही आवेदन दिया था। आवेदन पर ग्राम प्रधान केहस्ताक्षर भी सही पाए गए। बाद में ग्राम प्रधान ने स्वीकार किया कि हस्ताक्षर उसी के हैं। ग्राम प्रधान के स्पष्टीकरण को पर्याप्प्तन मानते हुए आयुक्त ने ग्राम प्रधान पर दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
यह तब है जबकि ग्र्राम प्रधान जन प्रतिनिधि हैं और खुद आयोग तीन से अधिक बार शासन को ग्राम प्रधानों से यह दायित्व हटाने को कह चुका है। पूर्व में इसके लिए ग्राम प्रधानों के साथ ही ग्राम विकास अधिकारी को सहायक लोक सूचना अधिकारी बनाया गया था और अधिक तर मामलों में जुर्माने सहायक लोक सूचना अधिकारियों पर ही हुए।
हद यह भी हुई कि प्रथम अपील को भी खंड विकास अधिकारी कार्यालय से मना कर दिया गया। बाद में यह ठीकरा डाक विभाग के मत्थे मढ़ा गया। कहा गया कि डाकिए ने कार्यालय में किसी को डाक नहींदी और अपनी तरफ से यह टिप्पणी लिखी कि डाक लेने से मना किया गया। इतना जरूर रहा कि प्रथम अपीलीय अधिकारी ने डाक विभाग से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा है।