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एक्सक्लूसिव: 'आरटीआई ने आम नागरिक को किया मजबूत, कानून में उचित बदलाव की भी जरूरत'; राधा रतूड़ी से खास बातचीत

Sat, 05 Sep 2026 01:37 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

दो दशक से अधिक का सफर तय कर चुका सूचना का अधिकार कानून आज भी आम नागरिक की ताकत बना हुआ है। हालांकि कानून के बेहतर इस्तेमाल और दुरुपयोग पर रोक के लिए इसमें जरूरी बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही है।
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मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू हुए 20 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। इस कानून ने आम आदमी को सूचना मांगने का अधिकार दिया है। इससे लोकतंत्र में आम नागरिकों की आवाज को बल मिला है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए अधिकारियों से लेकर सर्वोच्च अदालत तक ने अपनी चिंता जताई है।

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उत्तराखंड सूचना आयोग की मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने कानून के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए इसमें कुछ सुधार करने की आवश्यकता बताई है जिससे इसे और जनोपयोगी बनाया जा सके। प्रस्तुत है अमर उजाला संवाददाता अमित शर्मा से वार्ता के प्रमुख अंश।

सवाल- सूचना का अधिकार कानून ने एक लंबी यात्रा तय कर ली है। इसको देखते हुए इस कानून की उपयोगिता को लेकर आप क्या कहेंगी?

जवाब- इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह कानून आम आदमी के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ है। आज लोग अपना राशन कार्ड पाने से लेकर एफआईआर की कॉपी, स्थानांतरण पत्र, पहचान पत्र, अपने गांव में मनरेगा जैसी योजना में हुए कामकाज की जानकारी तक पाने के लिए आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं। इसने अधिकारियों के सामने आम आदमी के अधिकार को और अधिक मजबूत किया है। इससे आम नागरिकों की लोकतंत्र में भागीदारी और सशक्त हुई है।

 

सवाल- छोटी सी जानकारी पाने के लिए लोगों को आरटीआई लगानी पड़ती है। क्या यह प्रक्रिया हमारे लोक अधिकारियों की कार्य प्रणाली पर सवाल नहीं खड़े करती है?

जवाब- यह बात बिल्कुल है। मैं इससे सहमत हूं। यदि स्थानांतरण पत्र, पेंशन, राशन या वोटर कार्ड पाने के लिए लोगों को भटकना पड़ता है, उन्हें आरटीआई का सहारा लेना पड़ता है तो यह हमारे लोक सेवकों की कार्य प्रणाली और उनके सेवा के प्रति दृष्टिकोण पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करने वाली बात है। संभवतः इसके लिए हमारे समाज में व्याप्त सामंती सोच और अंग्रेजी शासन से ब्यूरोक्रेसी को मिली विरासत जिम्मेदार है। अधिकारियों को यह समझना पड़ेगा कि उन्हें जनता पर राज करने के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा करने के लिए रखा गया है।
 

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सवाल- सूचना अधिकार कानून लागू हुए 20 साल बीत चुके हैं, लेकिन कई सार्वजनिक उपक्रमों ने अब तक अपना मैनुअल जनता के लिए जारी नहीं किया है। आप क्या कहेंगी?

जवाब- इसका जवाब भी उसी सोच में छिपा हुआ है जहां सरकारी उपक्रम यह मानकर नहीं चलते कि जनता को सूचना देना उनका दायित्व है। यदि विभाग अपने मैनुअल जनता के लिए उपलब्ध कराएंगे तो इससे सरकारी विभागों के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। जनता अपने अधिकारों के बारे में ज्यादा जागरूक हो सकेगी। अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि मैनुअल के सार्वजनिक होने से कई मामलों में लोगों को आरटीआई का सहारा लेना ही नहीं पड़ेगा। इसके अलावा यदि विभागीय कामकाज या संगठनात्मक स्तर पर कोई कमी है तो इसको दूर करने में भी सहायता मिलेगी।

सवाल- कहा जाता है कि सूचना आयोग के पास अधिकारियों को आदेश देने का अधिकार है, लेकिन उसका पालन न होने पर कड़ा दंड देने की शक्ति नहीं है। क्या कहेंगी?

जवाब- यह पूरी तरह सही नहीं है। अपने काम में लापरवाही बरतने वाले या सूचना आयोग का आदेश न मानने वाले अधिकारियों के विरुद्ध हमें आर्थिक दंड लगाने, उन्हें नोटिस जारी करने और उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने के लिए संस्तुति करने का अधिकार है। हमारा अनुभव है कि कोई भी अधिकारी अपनी रिपोर्ट में यह नहीं लिखवाना चाहता कि उसके विरुद्ध आयोग की ओर से आर्थिक दंड या विभागीय कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। हमने देखा है कि केवल नोटिस देने से ही अधिकारी जनता का काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। हमारा अंतिम उद्देश्य आम आदमी का कार्य कराना है, अधिकारियों को दंड देना नहीं। हम इसी मनोभावना के साथ काम करते हैं।

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सवाल- आरटीआई ने आम आदमी की आवाज को ताकत दी है, लेकिन इसके दुरुपयोग को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। इस पर आपका क्या कहना है?

जवाब- यह आरोप भी अपनी जगह बिल्कुल सही है। हमारे अनुभव में भी आया है कि कुछ लोगों ने सूचना के अधिकार को एक हथियार बना लिया है। ऐसे लोग एक ही सूचना को बार-बार अलग-अलग तरीकों से मांगते हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य किसी अधिकारी, कंपनी या विभाग पर दबाव बनाना हो सकता है। हमने लोक सूचना अधिकारियों से कहा है कि वे एक ही सूचना को बार-बार देने में अपना समय नष्ट न करें। कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए केंद्र सरकार को कानून में उचित बदलाव करने पर भी विचार करना चाहिए।

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