सवाल- सूचना अधिकार कानून लागू हुए 20 साल बीत चुके हैं, लेकिन कई सार्वजनिक उपक्रमों ने अब तक अपना मैनुअल जनता के लिए जारी नहीं किया है। आप क्या कहेंगी?
जवाब- इसका जवाब भी उसी सोच में छिपा हुआ है जहां सरकारी उपक्रम यह मानकर नहीं चलते कि जनता को सूचना देना उनका दायित्व है। यदि विभाग अपने मैनुअल जनता के लिए उपलब्ध कराएंगे तो इससे सरकारी विभागों के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। जनता अपने अधिकारों के बारे में ज्यादा जागरूक हो सकेगी। अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि मैनुअल के सार्वजनिक होने से कई मामलों में लोगों को आरटीआई का सहारा लेना ही नहीं पड़ेगा। इसके अलावा यदि विभागीय कामकाज या संगठनात्मक स्तर पर कोई कमी है तो इसको दूर करने में भी सहायता मिलेगी।
सवाल- कहा जाता है कि सूचना आयोग के पास अधिकारियों को आदेश देने का अधिकार है, लेकिन उसका पालन न होने पर कड़ा दंड देने की शक्ति नहीं है। क्या कहेंगी?
जवाब- यह पूरी तरह सही नहीं है। अपने काम में लापरवाही बरतने वाले या सूचना आयोग का आदेश न मानने वाले अधिकारियों के विरुद्ध हमें आर्थिक दंड लगाने, उन्हें नोटिस जारी करने और उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने के लिए संस्तुति करने का अधिकार है। हमारा अनुभव है कि कोई भी अधिकारी अपनी रिपोर्ट में यह नहीं लिखवाना चाहता कि उसके विरुद्ध आयोग की ओर से आर्थिक दंड या विभागीय कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। हमने देखा है कि केवल नोटिस देने से ही अधिकारी जनता का काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। हमारा अंतिम उद्देश्य आम आदमी का कार्य कराना है, अधिकारियों को दंड देना नहीं। हम इसी मनोभावना के साथ काम करते हैं।
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सवाल- आरटीआई ने आम आदमी की आवाज को ताकत दी है, लेकिन इसके दुरुपयोग को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब- यह आरोप भी अपनी जगह बिल्कुल सही है। हमारे अनुभव में भी आया है कि कुछ लोगों ने सूचना के अधिकार को एक हथियार बना लिया है। ऐसे लोग एक ही सूचना को बार-बार अलग-अलग तरीकों से मांगते हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य किसी अधिकारी, कंपनी या विभाग पर दबाव बनाना हो सकता है। हमने लोक सूचना अधिकारियों से कहा है कि वे एक ही सूचना को बार-बार देने में अपना समय नष्ट न करें। कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए केंद्र सरकार को कानून में उचित बदलाव करने पर भी विचार करना चाहिए।