नरेंद्र मोदी से संघ को काफी उम्मीदें हैं। यही वजह थी कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस बार के लोकसभा चुनाव में अमह रोल निभाया।
1984 के बाद पहली बार भाजपा का झंडा उठाया
शायद संघ भी इस स्थिति को भांप गया था कि इस बार अभी नहीं तो कभी नहीं वाली परिस्थितियां पैदा हो गई है। जनता के बीच दिखावे से तो परहेज करते हुए संघ ने 1984 के बाद पहली बार भाजपा का झंडा उठाया।
लगातार नागपुर से निर्देश भी प्राप्त किए जा रहे थे। भाजपा के लिए पिछले तीन दशक से पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहे आरएसएस के पदाधिकारियों के पैरों में पड़ी जंजीरें भी इस बार टूट कर गिर गई।
नमो नमो की धुन बीच में ही ना रुक जाए इसलिए संघ के कमांडरों की फौज भी सड़कों पर उतर गई। खासतौर पर भाजपा का झंडा लगी गाड़ियों में बैठकर ही चुनाव प्रचार करने निकले।
कार्यालयों पर बैठकर दिया रणनीति को अंजाम
संघ ने केवल प्रचार ही नहीं किया बल्कि भारतीय जनता पार्टी के छोटे बड़े सभी कार्यक्रमों पर नजर रखी। संघ केपदाधिकारियों ने भाजपा मुख्यालय पर बैठकें करने के बजाय अपने कार्यालयों पर बैठकर ही रणनीति को अंजाम दिया।
कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम संघ की सहमति से ही जारी किए गए। भाजपा नेताओं की माने तो इस चुनाव में आरएसएस ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
संघ के जिला प्रचारक के पास जिले का जिम्मा था। उसके पास एक भारी भरकम टीम भी थी। वह जिले में होने वाले सभी कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग कर रही थी।
रोड-शो में कितनी भीड़ है इसका आंकलन भी किया जा रहा था। कौन से कार्यक्रम में भीड़ जुटी और कहां फीका रहा, सभी की रिपोर्ट तैयार कर नागपुर मुख्यालय भेजी जा रही थी।
वीवीआईपी कार्यक्रमों पर पूरी नजर रखी जा रही थी। क्षेत्रीय प्रचारक शिवप्रकाश ने पूरी कमान अपने हाथों में ले ली थी। प्रांत प्रचारक डा.हरीश लगातार मूवमेंट में रहे। संघ के नए नवेले कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर उतार दिया गया।