फैक्टरी में बड़ी मात्रा में देश की कई नामी और बड़ी कंपनियों की दवाएं मिलीं। एसपी देहात ने बताया कि फैक्टरी में 200 नामी कंपनियों के नाम से नकली दवाएं बनाई जा रही थीं। यह पता लगाया जा रहा है कि दवा का कच्चा मैटेरियल कहां से आ रहा था। मैटेरियल बनाकर इन्हें बेचने वाले कौन-कौन लोग हैं।
ये दवाएं हुईं बरामद
एसपी देहात ने बताया कि फैक्टरी में एंटी बायोटिक, वायरल-फीवर, थ्रोट इंफेक्शन, किडनी इंफेक्शन, ब्लॅड प्रेशर, सर्दी, जुकाम, घावों को सुखाने समेत अन्य नकली दवाएं बनाई जा रही थीं।
टीम में ये रहे शामिल
कोतवाली प्रभारी मनोज मैनवाल, एसआई ठाकुर सिंह रावत, एसआई विनय मोहन द्विवेदी समेत सिपाही विनोद बर्तवाल, देवेंद्र चपराना, ड्रग इंस्पेक्टर रुड़की मानेंद्र सिंह राणा और ड्रग इंस्पेक्टर देहरादून नीरज कुमार।
देशभर में सप्लाई
पुलिस और ड्रग विभाग की टीम ने आरोपी फैक्टरी मालिक से पूछताछ की तो उसने कई बड़े खुलासे किए। पूछताछ में उसने बताया कि वह नकली दवाएं ज्यादातर वेस्ट यूपी में सप्लाई करता था। इसके अलावा उत्तराखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा, बंगलूरू समेत अन्य प्रदेशों में नकली दवाओं की सप्लाई की जाती थी।
बड़ा गिरोह कर रहा है काम
एसपी देहात एसके सिंह ने बताया कि नकली दवाइयों को बनाने और उसे देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करने के पीछे एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है। आरोपी फैक्टरी मालिक को रिमांड पर लेकर इनके बारे में पूछताछ की जाएगी। गिरोह में जो भी लोग सामने आएंगे, उनके खिलाफ बड़ी कार्रवाई की जाएगी।
एक डिब्बे की कीमत पांच हजार
टीम को मौके से एक नामी कंपनी के डिब्बे भी मिले हैं। बताया जा रहा है कि यह दवा काफी महंगी है। इसके एक डिब्बे की कीमत बाजार में पांच हजार रुपये है। ऐसी ही कई और महंगी दवाएं बनाकर बेची जा रही थीं।
नकली दवा फैक्टरी चलाने के आरोप में पकड़ा गया प्रवीण त्यागी शातिर दिमाग है। पुलिस जांच में पता चला कि वह करीब दस साल पहले एक फार्मा कंपनी में काम करता था। यहां उसने दवा बनाने और कच्चा मैटेरियल की पूरी जानकारी जुटाई। इसके बाद नौकरी छोड़कर उसने खुद की फार्मा कंपनी खड़ी कर दी। इसकी आड़ में वह नकली दवाएं बनाने लगा।
मूल रूप से मेरठ के रहने वाले प्रवीण त्यागी एक आम परिवार से ताल्लुक रखता है। सूत्रों के अनुसार, वह पहले उत्तराखंड में ही एक फार्मा कंपनी में नौकरी करता था। यहां उसने कई वर्षों तक नौकरी की। इस बीच उसने दो से तीन फार्मा कंपनियों में काम किया। यहां उसने दवा बनाने का हुनर सीखा। साथ ही यह भी जानकारी जुटा ली कि कच्चा मैटेरियल कहां से आता है। इतना ही नहीं वह यह भी जान गया कि कौन सी कंपनी और दवाई की अधिक मांग है।
नौकरी छोड़ने के बाद उसने रुड़की में मकान किराये पर लिया और माधोपुर में एक दवा फैक्टरी खोल ली। किसी को शक न हो, इसलिए उसने फैक्टरी का नाम वीआर फार्मा रखा। यहां वह नकली दवाएं बनाने के साथ नामी कंपनी के रैपर में पैकिंग भी कराता था। सूत्रों के मुताबिक, वह यह काम पिछले पांच-छह साल से कर रहा था। यहां उसने कोठी खड़ी कर दी और अकूत संपत्ति बना ली। एसपी देहात एसके सिंह ने बताया कि आरोपी का पुराना इतिहास खंगाला जा रहा है।
सोता रहा विभाग, आरोपी करता रहा खेल
माधोपुर में नकली दवा फैक्टरी पकड़े जाने के मामले में स्थानीय और देहरादून ड्रग विभाग के अधिकारियों पर कई सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। जिस विभाग पर नकली दवाओं के खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है, उसे ही नकली दवा फैक्टरी चलने की भनक नहीं लग पाई। विभाग के अधिकारी कुंभकरणीय नींद सोते रहे और आरोपी पिछले कई वर्षों से नकली दवाएं बनाता रहा। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जो कार्रवाई ड्रग विभाग को करनी थी, वह पुलिस ने की। आखिर ड्रग विभाग को क्यों पता नहीं चल पाया कि माधोपुर में इतने वर्षों से नकली दवा की फैक्टरी चल रही थी।