ऐसे काम करता है सिस्टम
उत्तराखंड में वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा के दृश्य लोगों के जेहन मेें आज भी ताजा हैं। जलप्रलय ने केदारघाटी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था और सारे संपर्क टूट गए थे। ऐसे में यदि ‘रेस्क्यू मोबाइल सिस्टम’ होता तो सबसे पहले सभी रेस्क्यू टीमें एक नेटवर्क के जरिए आपस में जुड़ जातीं। केदारनाथ की लाइव तस्वीरें सेटेलाइट के माध्यम से जिला मुख्यालय पर दिखाई देती। जो लोग मलबे में दब गए थे या आसपास के जंगलों में भटक गए थे, यदि उनके पास मोबाइल होता तो सिग्नल नहीं होने की स्थिति में भी उन्हें ढूंढ़ा जा सकता था।
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मलबे में दबे लोगों को ऐसे ढूंढता है सिस्टम
यदि कोई बिल्डिंग गिर जाए, भूस्खलन में बहुत सारे लोग दब जाएं, तब यह सिस्टम उस एरिया के सभी मोबाइल को डिटेक्ट कर लेता है। इसके बाद सभी मोबाइल में एक मैसेज भेजता है, जिसमें तीन ऑप्शन होते हैं। पहले ऑप्शन में मलबे में दबा व्यक्ति एक नंबर दबाता है, जिसका मतलब होता है मैं ठीक हूं। दो नंबर दबाने का मतलब है मदद चाहिए और यदि कोई रिस्पांस नहीं मिले तो समझो व्यक्ति या तो बेहोश है या मर चुका है।