मिट्टी में खारापन और क्षारीय तत्व बढ़ने से गंगा किनारे की जमीन लगातार बंजर हो रही है। सबसे खतरनाक स्थिति यूपी में है, जहां 20 जिलों के 1156 गांव बुरी तरह प्रभावित हैं, जहां 69,400 हेक्टेयर भूमि खारेपन की चपेट में है।
यहां सहयोगी नदियां के बेसिन में भी खारापन बढ़ रहा है। इससे बेसिन ऊसर होगा और धरती बंजर हो जाएगी। हालत यह है कि ऋषिकेश (उत्तराखंड) से राजमहल (पश्चिम बंगाल) तक गंगा बेसिन के एक लाख वर्ग किमी क्षेत्र की मिट्टी क्षारीय हो गई है।
केंद्र सरकार के वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान, देहरादून और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद के विज्ञानियों की टीमों ने 2010 से लगातार पांच साल तक सर्वेक्षण करने के बाद यह ताजा रिपोर्ट सौंपी है। वाडिया के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. संतोष राय और प्रयोगशाला के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. सुनील सिंह बताते हैं कि उत्तराखंड के हरिद्वार में खारापन अधिक नहीं है, लेकिन जैसे ही गंगा उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है हालत बिगड़ी मिली।
बेसिन की मिट्टी बंजर होने का मुख्य कारण पानी का मार्ग रुकना है। इससे बेसिन में जलभराव हो रहा है। पानी तो वाष्प बन कर उड़ जाता है लेकिन टीडीएस छोड़ जाता है, जिससे क्षारीय और अमलीय तत्व मिट्टी को ऊसर कर रहे हैं।
यूपी के जिलों में भूमि के बंजर होने की स्थिति
अलीगढ़: 26 गांव, 1500 हेक्टेयर, इलाहाबाद: 40 गांव 2500 हेक्टयर, आजमगढ़: 79 गांव, 4700 हेक्टेयर, एटा: 42 गांव, 3700 हेक्टेयर, इटावा: 62 गांव, 3000 हेक्टेयर, फतेहपुर: 50 गांव, 2400 हेक्टेयर, फर्रूखाबाद: 43 गांव, 4000 हेक्टेयर, गाजीपुर: 76 गांव, 3900 हेक्टेयर, हरदोई: 85 गांव 4500 हेक्टेयर, जौनपुर: 73 गांव, 5000 हेक्टेयर, कन्नौज: 46 गांव, 4000 हेक्टेयर, कानपुर देहात: 49 गांव, 3000 हेक्टेयर, कानपुर नगर: 49 गांव 2600 हेक्टेयर, लखनऊ: 64 गांव, 4500 हेक्टेयर, मैनपुरी: 61 गांव, 4000 हेक्टेयर, प्रतापगढ़: 62 गांव, 3000 हेक्टेयर, रायबरेली: 54 गांव, 3000 हेक्टेयर, संत रविदासनगर: 69 गांव, 3300 हेक्टेयर, सुलतानपुर: 61 गांव, 2800 हेक्टेयर, उन्नाव: 55 गांव, 4000 हेक्टेयर।
यहां देखें, गंगा और सहयोगी नदियों का टीडीएस
गंगा
ऋषिकेश-108 मिग्रा प्रति लीटर
वाराणसी-477 मिग्रा प्रति लीटर
पटना-381 मिग्रा प्रति लीटर
राजमहल-280 मिग्रा प्रतिलीटर
यमुना-574 मिग्रा प्रति लीटर (इलाहाबाद से सैंपल)
गोमती-388 मिग्रा प्रति लीटर (गाजीपुर से सैंपल)
घाघरा-266 मिग्रा प्रति लीटर (रिवलगंज से सैंपल)
राप्ती-331 मिग्रा प्रति लीटर (गोरखपुर से सैंपल)
गंडक-216 मिग्रा प्रति लीटर (हाजीपुर से सैंपल
कारण
-बिना योजना के नहरों का जाल बिछा दिया जाना
-बाढ़ और नहरों का पानी गंगा में वापस लौटने का मार्ग अवरुद्ध होना
-गंगा के किनारे पेवमेंट बनाने से पानी रुकना
-बेसिन में वॉटर लॉगिंग बढ़ना
बचाव
-इस्तेमाल केअलावा बचा पानी वापस गंगा में पहुंचाना
-खेतों केकिनारे छोटी-छोटी नालियां बनाना
-खेतों में जरूरत से अधिक पानी भरा न रहने देना
-गंगा में पानी जाने केलिए नालियां बनाना
-एक्सप्रेस हाई-वे पर फ्लाई ओवर बनाना
-सरकारी नीतियों में इस बिंदु को शामिल किया जाना
ऐसे आया है खारापन
-जलभराव होने पर पानी वाष्प बनकर उड़ने लगता है और इसके तत्व रह जाते हैं। सोडियम कार्बोनेट, सोडियम बायो कार्बोनेट, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेजियम, सल्फेट, सिलिका आदि तत्वों केजमाव से क्षारीय जमाव बढ़ा और मिट्टी की उर्वरकता खत्म होने लगी।
इनका है कहना
गंगा बेसिन में पानी का प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है। बाढ़ आने पर पानी बाहर तो चला जाता है, लेकिन वापस नदीं में लौट नहीं पाता। गंगा की नहरों का सिंचाई से बचा पानी नदी में नहीं लौटता। इसका जगह-जगह जलभराव हो जाता है जिसकेवाष्पीकृत होने केबाद बचे टीडीएस से मिटटी को बंजर बना रहे हैं। यह स्थिति दसियों साल में पैदा होती है। अभी इसे सुधारा जा सकता है।
-डॉ. संतोष कुमार राय, वरिष्ठ विज्ञानी वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान