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मिशन 2017 के प्लान का हिस्सा है बागियों का विलय

Thu, 19 May 2016 04:27 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून

सार

  • - अधिकांश बागियों की अपने विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत स्थिति 
  • - बागियों की काट के लिए कांग्रेस के पास फिलहाल सीमित विकल्प
  • - कुछ बागियों के विधानसभा क्षेत्र भी बदले जाने की संभावना
  • - चुनाव के अलावा भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाएंगे बागी 
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हरक सिंह और विजय ‌बहुगुणा - फोटो : file photo
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विस्तार
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कांग्रेस के नौ बागियों का विलय भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनावों की रणनीति का अहम हिस्सा है। बागियों को लेकर प्रदेश लीडरशिप में कसमसाहट के बावजूद केंद्रीय लीडरशिप का निर्णय विधानसभा चुनाव में भाजपा की संभावनाओं को देखकर लिया गया है।
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लीडरशिप ने सभी बागियों की पॉल्टिकल बैकग्राउंड का आकलन कर उनके विधानसभा क्षेत्रों में पकड़ को आधार बनाया है। नौ बागियों से अधिकांश अपने विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत हैं, जिसका फायदा भाजपा उठाना चाहती है। कांग्रेस की दिक्कत यह है कि बागी अपने साथ विधानसभा क्षेत्र में बूथ स्तर पर उसे नुकसान पहुंचाएंगे। इतना ही नहीं भविष्य में कांग्रेस में सेंधमारी के लिए बागी भाजपा के लिए अहम साबित हो सकते हैं।

बागियों के भाजपा में शामिल होने से साबित हो गया कि 18 मार्च से शुरू हुआ सियासी घमासान अभी शांत नहीं होगा। भाजपा बागियों को लेकर एक तीर से कई निशाने साधने की रणनीति लेकर चली थी, जिसमें सरकार गिराने की कोशिश भले नाकाम हो गई पर अब अगली सरकार किस तरह से भाजपा की बने इसपर कसरत शुरू कर दी है।
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कांग्रेस के सामने यह है बागियों का प्लान

कांग्रेस के नौ बागियों ने थामा भाजपा का हाथ। - फोटो : पीटीआई
भाजपा अधिकांश बागियों को उन्हीं की मूल विधानसभा से टिकट देगी, जिसका तोड़ तलाशने में कांग्रेस को खासी मेहनत करनी पड़ेगी। सियासी घटनाक्रम में हरीश रावत के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलने वाले हरक सिंह रावत कांग्रेस से पहले भाजपा में रहे हैं, जिनका रूझान इस बार देहरादून जनपद से है।

पूर्व सीएम विजय बहुगुणा ‌स‌ितारगंज से जीतकर विधानसभा पहुंचे। हालांकि उनकी सियासी कर्मस्थली टिहरी संसदीय क्षेत्र रही है, लेकिन सीतारगंज में उनकी बंपर जीत भाजपा के लिए अच्छा संकेत है। विजय बहुगुणा के लिए सबसे बड़ी दिक्कत पिता हेमवती नंदन बहुगुणा की सियासी विरासत को भाजपा में रहकर साथ लेकर चलने की रहेगी।

बहुगुणा विधानसभा चुनाव में उतरते हैं या फिर अपने वारिस को उतारते हैं मामला उस पर टिका है। हरक सिंह रावत का विधानसभा चुनावों में मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। हालांकि देहरादून शहर की विधानसभा सीटों में भाजपा के मौजूदा समीकरण उनके आने से बिग़ड़ सकते हैं। धर्मपुर, डोईवाला और सहसपुर विधानसभा के अलावा उनके पास शहर में कोई विकल्प नहीं है। डोईवाल में त्रिवेंद्र सिंह रावत की दावेदारी और सहसपुर में सहदेव पुंडरी सीटिंग विधायक होने से उनके लिए धर्मपुर विकल्प बचता है। ऐसे में हरक को अपनी शुरूआती सियासी कर्मस्थली पौड़ी का रुख भी करना पड़ सकता है।
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भाजपा को मिलेगा कांग्रेस विधायकों का जनाधार

कांग्रेस के नौ बागियों ने थामा भाजपा का हाथ। - फोटो : पीटीआई
विधानसभा जसपुर के पूर्वविधायक डॉ. शैलेंद्र मोहन सिंघल अपनी विधानसभा के मजबूत नेता है। कई बार के विधायक सिंघल के खिलाफ कांग्रेस को नया प्रत्याशी तैयार करना आसान नहीं रहेगा। देहरादून जनपद की रायपुर से पहली बार जीते उमेश शर्मा काऊ का मजबूत जनाधार है, जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा। हालांकि इस सीट पर भाजपा के कई दावेदार थे, जिन्हें उमेश के साथ लाना पार्टी के लिए खासी चुनौती रहेगी।

नरेंद्र नगर से विधायक रहे सुबोध उनियाल के लिए भाजपा में आना फायदे का सौदा प्रतीत हो रही है। उनके खिलाफ ओम गोपाल रावत चुनाव लड़ते हैं, लेकिन वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद छोड़कर ओमगोपाल भाजपा के प्रत्याशी बने थे। ऐसे में ओमगोपाल की दिक्कतें बढ़ेंगी। सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत रामनगर से विधायक हैं, लेकिन वहां जातीय और सामुदाय आधारित समीकरण कांग्रेस को अधिक सूट करते हैं ऐसे में वह रामनगर से पलायन भी कर सकती हैं।

केदारनाथ को जिस तरह से सीएम हरीश रावत ने प्राथमिकता दी है उससे बागी होकर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायक शैलारानी की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। रुड़की से विधायक प्रदीप बत्रा के लिए भाजपा में आना कितना फायदा देगी यह वहां से कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित होने के बाद ही तय हो पाएगा। खानपुर से विधायक रहे कुंवर प्रणव चैम्पियन क्षेत्र से कई बार के विधायक हैं। इनकी दावेदारी को लेकर भाजपा के रणनीतिकार काफी हद तक आश्वस्त हैं। उनके लिए चुनौती यह है कि भाजपा के चुनाव चिन्ह पर अल्पसंख्यक फैक्टर को अपने साथ किस तरह से जोड़े रखते हैं।
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