देश के चार कुंभ नगरों में नासिक ही अकेला ऐसा क्षेत्र है, जहां कुंभ मेला दो अलग-अलग नगरों में होता है।
देश-विदेश के श्रद्धालु एक से दूसरे नगर जाकर कुंभ की दृश्यावली का आनंद लेते हैं। शायद यही कारण है कि हरिद्वार और प्रयाग के कुंभ जैसे झगड़े नासिक में कभी नहीं हुए। जहां तक हरिद्वार का सवाल है यहां अनेक कुंभ मेले हिंसक होते आए हैं। कई शताब्दियों में कभी बैरागी और संन्यासी तो कभी संन्यासी और निर्मलों के बीच संघर्ष हुए हैं।
हरिद्वार के कुंभ मेलों पर मुगल जागीरदारों ने भी आक्रमण किए हैं। हरिद्वार कुंभ में खुद साधुओं के बीच भीषण हिंसा होती आई है। बैरागियों और संन्यासी के संघर्ष के कारण कई कुंभ मेलों पर बैरागियों ने हरिद्वार और प्रयाग जाना छोड़ दिया था। इसी लिए बैरागियों का कुंभ आज तक भी एक पर्व के लिए वृंदावन में लगता है।
उज्जैन में भी संघर्षों का इतिहास मौजूद है। तैमूर लंग ने हरिद्वार कुंभ के अवसर पर अपनी सेना के साथ साधुओं पर चढ़ाई कर उन्हें लहूलुहान कर दिया था। नासिक में कभी झगड़ा नहीं हुआ। कारण स्पष्ट है। नासिक कुंभ गोदावरी के किनारे नासिक और त्र्यंबकेश्वर दो स्थानों पर लगता है। दोनों के बीच अच्छा-खासा फासला है।
10 अखाड़े त्र्यंबकेश्वर और तीन अखाड़े नासिक में डेरे जमाकर स्नान करते हैं। दो अलग-अलग स्थानों पर कुंभ लगने से संतों के बीच कोई टकराव नहीं होता। नासिक के इतिहास में अखाड़ों के संघर्ष की एक भी घटना विद्यमान नहीं है।