तेजी से फैलता है और लिपिड भी ज्यादा
दुर्लभ प्रजाति के सूक्ष्म शैवाल मिलने के बाद बायो डीजल बनाने में इसकी उपयोगिता पर शोध किया गया। भारत में कुछ स्थानों पर शैवाल से बायो डीजल बनाने का काम चल रहा है। प्रीति ने बताया कि यह शैवाल तेजी से फैलता है और इसमें लिपिड (वसा) की भी अच्छी खासी मात्रा होती है। विश्वविद्यालय की एल्गल लैब में शोधकर्ताओं ने लगभग 109 प्रजाति के शैवालों में लिपिड का तुलनात्मक अध्ययन किया। सामान्यतया शैवाल में 25 से 30 फीसदी लिपिड मिलता है। वहीं, सूडोबोहलिनिया में सामान्य परिस्थिति में सबसे अधिक 33 फीसदी लिपिड मिला। अनुकूल वातावरण मिलने पर लिपिड की मात्रा काफी बढ़ गई जो बायो डीजल बनाने के लिए काफी बेहतर है। लिपिड ही बायो डीजल का प्रमुख स्रोत है।
ये भी पढ़ें...शुरुआती दौर में ही हांफने लगा रोपवे: 25 मिनट तक हवा में ही अटकी रहीं लोगों की सांसे, तस्वीरों में देखें आफत के वो पल
शैवाल पर काम की जरूरत
पेट्रोलियम ईंधन की सीमित मात्रा को देखते हुए विकल्प के तौर पर बायो डीजल पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार की बायोफ्यूल नीति के तहत पेट्रोलियम ईंधन मेें 20 प्रतिशत तक बायो डीजल मिलाने का लक्ष्य है लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। यदि सरकार सूक्ष्म शैवाल के उत्पादन पर जोर देती है तो सूडोबोहलिनिया जैसी प्रजातियां बेहतर विकल्प बन सकती हैं।