इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट दिल्ली का दरवाजा खटखटाया, जहां चार साल सुनवाई चली। हाईकोर्ट ने 2018 में अपने फैसले में सात पुलिसकर्मियों को दोषी मानते हुए निचली अदालत की सुनाई सजा को बरकरार रखा था जबकि 11 पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया था।
इस फैसले को लेकर सात पुलिसकर्मियों (एसके जायसवाल, नितिन चौहान, राजेश, चंद्रमोहन रावत, जीडी भट्ट, नीरज यादव व अजीत सिंह) ने देश की सर्वोच्च अदालत में अपील की, जिसे बुधवार को स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका स्वीकार होने को इन पुलिसकर्मियों के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
तीन जुलाई 2009 को देहरादून पुलिस ने एक बदमाश को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। पुलिस के अनुसार आरोपी आराघर चौकी इंचार्ज जीडी भट्ट का सर्विस रिवाल्वर लूटकर भागा था। बाद में उसकी पहचान रणबीर निवासी खेकड़ा, जिला बागपत के रूप में हुई थी।
मुठभेड़ को लेकर भारतीय किसान यूनियन समेत कई संगठनों ने दून में हंगामा किया था। दो दिन बाद आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस कटघरे में आ गई थी। रणबीर के शरीर पर गोलियों के 22 निशान पाए गए थे।
यही नहीं रिपोर्ट में ब्लैकनिंग यानी सटाकर गोलियां मारना और 28 चोटों के निशान भी पाए गए। इस मामले में पहले सीबीसीआईडी ने विवेचना की और फिर सीबीआई ने इसकी सारी परतें उधेड़ दी थी।