एक अक्तूबर 1994 को टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग से बसों से आंदोलनकारी दिल्ली कूच करने के लिए ऋषिकेश में एकत्रित हुए थे। ऋषिकेश से सभी आंदोलनकारी रैली के रूप में बसों से आगे निकले। जैसे ही रुड़की में पहुंचे तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के वाहनों को रुड़की बोट क्लब पर रोक दिया था। यहां से आंदोलनकारी जैसे-जैसे आगे निकले। जब नारसन बार्डर पर पहुंचे वहां मुजफ्फरनगर पुलिस ने आंदोलनकारियों को जिले की सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया। रात के नौ से सुबह चार बजे तक पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प होती रही। चार बजे तड़के पुलिस की मारपीट में कई महिलाओं को चोट लगी। चार बजे रामपुर तिराहे पर मुजफ्फरनगर पुलिस ने गोली चला दी। इसमें कई प्रदर्शनकारी शहीद हो गए थे। रामपुर तिराहे गोलीकांड को याद कर अब भी मेरी रूह कांप जाती है।
-त्रिवेंद्र सिंह पंवार, आंदोलनकारी
मैं भी 1994 में उत्तराखंड आंदोलन में शामिल हुआ था। उस समय में आंदोलनकारियों में मैं सबसे छोटा आंदोलनकारी था। जो घटना उस रात को हुई, वह दृश्य याद कर दिल आज भी झकझोर उठता है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठीचार्ज किया था। हम सब तितर-बितर हो गए थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, हो क्या रहा है।
-हेमंत डंग, आंदोलनकारी
आज भी जहन से नहीं निकला मुजफ्फरनगर गोलीकांड
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच 2 अक्तूबर 1994 को हुआ मुजफ्फरनगर गोलीकांड लोगों के जहन से भुलाए नहीं भूलता। उस गोलीकांड को याद करते ही आज भी राज्य आंदोलनकारी सिहर उठते हैं।
राज्य आंदोलनकारी भगवान सिंह बताते हैं कि किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि पुलिस गोलीबारी कर सकती है। पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली और लाठी बरसानी शुरू कर दी। नारसन स्थित राजा महेंद्र प्रताप डिग्री कॉलेज के प्रबंध समिति के सचिव नरेश चौधरी ने बताया कि आंदोलनकारियों के साथ टकराव तो नारसन से ही शुरू हो गया था। उनके डिग्री कॉलेज स्थित हॉस्टल में सैकड़ों आंदोलनकारियों को शरण दी गई थी।