फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रामपुर तिराहा गोलीकांड के 25 साल: आंदोलनकारियों को आज भी बेचैन करते हैं ये पांच बड़े सवाल

Wed, 02 Oct 2019 08:27 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
रामपुर तिराहा गोलीकांड - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
विज्ञापन

रामपुर तिराहा कांड की 25वीं बरसी पर एक बार फिर राज्य के शहीदों का संघर्ष और कुर्बानी याद की जा रही है। साथ ही राज्य आंदोलन की मूल अवधारणा के उन सवालों के भी जवाब तलाशे जा रहे हैं, जो राज्य आंदोलनकारियों की निगाहों में आज नेपथ्य में चले गए हैं।

विज्ञापन


उनकी मानें तो पर्वतीय राज्य की जिस मूल अवधारणा के लिए लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, वो आज भी हाशिये पर है। अवधारणा से जुड़े पांच प्रमुख सवाल उन्हें राज्य गठन के 19 साल बाद भी शिद्दत से साल रहे हैं, जिनके हल वे सबसे पहले होते देखना चाहते थे।

Trending Videos

ये सवाल करते हैं परेशान

1. दोषियों को सजा क्यों नहीं मिली?
1994 में देर रात को रामपुर तिराह में तत्कालीन यूपी पुलिस ने राज्य आंदोलनकारियों के साथ जो जघन्य अपराध किया, उसकी सजा दोषियों को आज तक क्यों नहीं मिली? राज्य गठन के बाद सत्ता पर काबिज रहीं सरकारों से ये अपेक्षा थी कि वे दोषियों को सलाखों के पीछे भेजती, लेकिन सरकारों के लिए ये सवाल गैरजरूरी हो गया। प्रदेश सरकार की ओर से इस मसले को सीबीआई कोर्ट में नए और प्रभावी ढंग से लड़ने की कोशिश तक नहीं हुई।

2. पहाड़ की राजधानी पहाड़ में क्यों नहीं?
आंदोलनकारियों को इस सवाल का जवाब भी अब तक नहीं मिल पाया है। राज्य गठन के 19 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन स्थायी राजधानी तक तय नहीं हो पाई है। राजधानी आयोग बनाने से लेकर उसकी रिपोर्ट छुपाने और उसे मतलब से दिखाने के अलावा सरकारों की ओर से वहां विधानमंडल भवन बनाने और वहां कुछ सत्र आयोजित करने का ही काम हो पाया। लेकिन राजधानी के मसले पर गैरसैंण आज भी एक अबूझ पहेली है।

ये भी है मुद्दे

3. पलायन, पर्यटन और रोजगार की ठोस नीति क्यों नहीं?
पलायन राज्य आंदोलन की अवधारणा का सबसे प्रमुख मुद्दा रहा और आज भी प्रदेश सरकार के लिए ये सबसे गंभीर प्रश्न है। जबकि राज्य गठन के बाद इस सवाल का सबसे पहले हल तलाशे जाने की उम्मीद की जा रही थी। पर्यटन को तो राज्य की आर्थिकी की रीढ़ माना गया और सबसे अधिक रोजगार की संभावनाएं इसी क्षेत्र से पैदा होने का सपना देखा गया। लेकिन इनमें से कोई भी सपना साकार नहीं हो पाया। 

4. शिक्षा अब भी हाशिये पर क्यों?
शिक्षा भी राज्य आंदोलन की अवधारणा का मूल मसला रहा। आंदोलनकारियों का मानना था कि राज्य बनेगा तो पर्वतीय क्षेत्रों में स्कूल और कालेज खुलेंगे। वहां पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध होंगे, लेकिन आज सरकारें सरकारी स्कूलों में ताला लगा रही है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गांव खाली हो रहे हैं। इस कारण स्कूल और कालेजों में छात्र संख्या गिर रही है। आंदोलनकारियों का सवाल है कि पहाड़ उतरकर मैदान में आ जाए, इसलिए तो उन्होंने संघर्ष नहीं किया था।

5. आज भी क्यों नहीं मिलता डाक्टर व दवा?
आंदोलनकारियों का एक बड़ा प्रश्न स्वास्थ्य से जुड़ा है। लेकिन राज्य आंदोलन की अवधारणा का यह प्रश्न भी नेपथ्य में चला गया। आज भी पहाड़ में डाक्टर और दवा दोनों नहीं है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जिला अस्पताल आज रेफरल सेंटर बन गए हैं। 
विज्ञापन

इनका है कहना

सरकार की असंवेदनशीलता और उपेक्षा के चलते राज्य वासियों, शहीद परिवारों और पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। दोषियों की मदद होती रही और वे एक एक करके प्रमोशन पाते गए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य आंदोलन की अवधारणा के सवाल सरकारों के एजेंडे में कभी रहे नहीं। 
- रविंद्र जुगरान, पूर्व उपाध्यक्ष, राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद 

25 साल कम नहीं होते। हमें बेहद पीड़ा है कि हमारी सरकारों ने रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए पहल नहीं की। राज्य अवधारणा के सवाल हाशिये पर हैं। जिस उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना की गई थी, अभी वह नहीं बन पाया है। 
- प्रदीप कुकरेती, राज्य आंदोलनकारी
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें