हरिद्वार पहुंच कर महात्मा गंगापार गुरुकुल कांगड़ी जाकर स्वामी श्रद्धानंद से मिले। इसके बाद उन्होंने हरिद्वार नगर पहुंचकर लाखों स्नानार्थियों की भीड़ देखी। उन्हें लगा कि जिस शक्ति से वे अलग-अलग क्षेत्रों से मिलकर गंगा नहाने आ रहे हैं, उसी शक्ति से उन्हें देश की आजादी के लिए भी एक जुट किया जा सकता है।
लाल कुमार कश्यप के अनुसार दूसरी बार बापू 1917 में गुरुकुल में व्याख्यान देने हरिद्वार आए। उस समय में भी उन्होंने हरिद्वार में घूमकर भीड़ से प्रेरणा ली। बापू ने सत्य के प्रयोग नामक अपनी आत्मकथा में लिखा कि देश वासियों से सीधे संवाद स्थापित करने की प्रेरणा उन्हें गंगा के इसी तट ने दी। बाद में 1927 में बापू एक बार फिर हरिद्वार रुकते हुए देहरादून, मसूरी, कौसानी, अल्मोड़ा गए।
बापू को 1917 में स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल में पहली बार महात्मा की उपाधि प्रदान की थी। 20 वर्ष बाद गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन में एक बार फिर से उन्हें महात्मा की उपाधि से अलंकृत किया। बापू ने जीवन भर महात्मा का स्वरूप ही अपनाए रखा।
हरिद्वार में लिया पांच वस्तुओं का संकल्प
महात्मा गांधी ने हरिद्वार में स्नान करने आए लोगों की गरीबी देखी तो उन्होंने पूरे दिन में केवल पांच वस्तुएं लेने का संकल्प लिया। बापू ने स्वयं कहा है कि गरीबों को दो-जून का भोजन भी नसीब नहीं। ऐसे में अधिक खाद्य पदार्थ नहीं किए जा सकते।