सत्ता को मोह और नेतागिरी की चाहत क्या नहीं करवा देती। इंसान बेशर्म तक हो जाता है, और यदि पहले व्यक्ति की तूती बोलती हो तो फिर क्या कहने। हालात बदल जाएं, माहौल बदल जाए अरे यहां तक राज्य ही क्यूं न बदल जाए नेताजी तो अभी भी घाघ हैं।
चेले 50 से 5 भी क्यूं न हों जाएं लेकिन जनाधार की यादें तो हैं ना जी, फिर भला नेता जी इतराए क्यूं न। इतराने पर तो पाबंदी नहीं हैं न जी। नेता जी के पास पार्टी में न पद है और न दायित्व, लेकिन नेता जी का जलवा-जलाल कायम है। ऐसा भौकाल कि पार्टी के मुखिया को एक बार कोई पूछे न पूछे, जनाब की पूछ बनी रहती है।
अभी हाल ही की बात है मुख्यमंत्री बहुगुणा ने की ओर से आपदा पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में पार्टी के मुखिया की बजाए नेता जी ही नजर आए। बैठक में पहुंचे दूसरे नेता उनसे यह तक नहीं पूछ सके कि उनकी पार्टी के मुखिया क्यों नहीं आए। बस हर जगह नेता जी की जुबान पार्टी की ओर से कैंची की तरह काटने को दौड़ती।
भई ऐसा आखिर हो भी क्यूं ना उत्तराखंड बनने से पहले संयुक्त उत्तर प्रदेश में नेता जी की हनक थी। बड़े-बड़े शूरमा सलाम ठोकने आते थे। राज्य क्या बना, प्रदेश की जनता के लिए उनकी पार्टी अछूत सी हो गई, लेकिन नेता जी पर इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
फर्क पड़े भी तो क्यूं उत्तराखंड में ऐसे कई महानुभाव जो बैठे हैं, जो चाचा-ताऊ या पिताजी के सहारे ही पद पर न होते हुए भी बने हुए हैं, बिना मशक्कत किए हुए, फिर नेता जी ने एक दौर में अपने रुतबे को महसूस किया ही है। बहरहाल सर्वदलीय बैठक में अन्य नेतागण अपने बीच में नेताजी को लेकर चुटकी लेते रहे।